शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

चकाचौॆध का अंधेरा-एक

आदरणीय, प्रियवर,
नमस्कार। प्रकाशक जी ने संग्रह की अपेक्षित प्रतियां भेजी नहीं सो आपको भेज नहीं पाया। संग्रह  की कविताएं कम से कम आपकी नजर से गुजर ले, इस इरादे से ईमेल के जरिए आप तक पहुंचा रहा हूं। कृपया अपनी राय दीजिएगा दो-चार शब्द लिख कर।
सादर
शैलेंद्र शांत
1.
बेधड़क
..........
शब्दों को भी
आती है शर्म
सहमते हुए ही कहा-
माफ कीजिएगा
मैं किसी बाड़े में
नहीं रह सकता
घुटने लगता है
मेरा दम।
2.
चाह
......
चुप्पी ने कहा
शोर से
तुम जोर लगाओ
पुरजोर शोर मचाओ
मैं देखना चाहती हूं
असर तुम्हारे शोर का।
3.
सभी
.......
मैं तुम्हें नहीं कर पाऊंगा
स्थगित
तुम्हें मैं अपने हाथ-पांव दूंगा
तुम्हें दूंगा
सुरक्षित गर्भ
सहेज कर रखूंगा तुम्हें
तुम्हारे नन्हें हाथों के स्पर्श से
जुड़ा लिया करूंगा हृदय को
मेरी तृप्ति से निढाल होंगे सभी।
4.
हादसे
........
वजहें तलाश लीजिएगा
सुर्खियों में ब्यौरे हैं
बेशुमार बर्बादियों के
लूट कि जैसे मौलिक अधिकार
औरतें कि महज जिस्म हों जैसे
मौतें कि जैसे गिनतियां।
5.
वापसी
.........
बहके कदम
जब थक-हार जाते हैं
पछताते हैं
लौट आते हैं
उसी परिचित
इलाके में।
6.
शांति
.......
कहना बस इतना है
कि मिलना चाहता हूं
कहां मिलूं तुमसे
तुम ही बता दो
कि जहां भंग न होती हो
किसी की शांति, कहां मिलूं तुमसे
निर्जन वन में
विस्तृत रेगिस्तान में
अंतरिक्ष में
पाताल में
या सपने में
7.
चयन
.......
इस इलाके में
शब्द है
नाद है
संवाद है
और उस मुहल्ले में
धमकी है
नफरत है
उन्माद है
और है प्रमाद
आजादी है आपको
चाहे जिसे चुन लें।
8.
यदा-कदा
.............
अपराधियों पर
खीझ उतार लिया करते हैं
यदा-कदा
यदा-कदा
बगलगीर
हो लेते हैं
मौके की नजाकत को समझते हैं।
9.
शक
.......
एक मानसिक रोग है शक
मनोविज्ञान यह कहता है
फिर भी न करें शक
तो शक होने लगता है
कि पुर्जे सलामत तो हैं
दिल-दिमाग के
चीजें जहां होनी चाहिए
वहां से गुम गई हैं
फिर क्यों न करें शक
क्यों न करें सवाल
अपनी धुरी से तो
धरा भी नहीं छिटकती
जब खिसकती है जरा भी
तो आ जाता है भूचाल
पर दरपेश खौफनाक मंजर के बावजूद
जलजला दिलों में न आए
तो शक लाजिमी है
शक महज मानसिक रोग नहीं।
10.
समझदारी
..............
हम इनके मुरीद हैं
वह उनके
और वे हम दोनों के
अलग-अलग जब मिलते हैं
समझदारी इसी को कहते हैं।
11.
पछतावा
...........
मानवगंध
खींच लाते हैं निर्बंध
और तू चली आती है
बदलने स्वाद
और पा लेती है मुक्ति इहलीला से
क्या विसंगति है
हालांकि यह मंशा
नहीं हो सकती किसी की
कि मसल ही दे तुझे
बस यूं ही
जैसे कि मानो
कोई अस्तित्व ही न दे तुम्हारा
पर तेरे डंक की चुभन भी
क्या कम होती है
फिर कोई क्यों न तिलमिलाए
पछताए, वह भी पछताए
तुझे मसल कर।
12.
जैसे कि स्त्री
................
बेमतलब की बातों में
न वक्त दिखता है
न उसका नासूर
इसीलिए हुजूर
अक्सरहा खामोश रहते हैं
वक्त जरूरत
जरूर बोलते हैं
जब दिल से निकलती है पुकार
तो हो जाते हैं लाचार
वरना खामोश ही रहते हैं
ज्वाला सीने में
धधकने दिया करते हैं
कमोवेश पीड़ा
चुपचाप सहते हैं
जैसे कि सहती जाती है स्त्री।
13.
तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं
...........................................
दो कदम हम जो चले
तुम भी चले
साथ-साथ
थके-हारे
जब भी लौटा
तुम्हारे पास
तुमने ही न टूटने दिया विश्वास
सब की नजरों में गिर चुका था जब
तुमने न छोड़ा साथ
मैं नहीं तुमने ही
तुमने ही
संभाला मुझे
पाला मुझे
यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं
डूबते को तिनके का
एक मात्र भरोसा थी तुम
पीछे लौटता हूं जब कभी
तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं।
14.
कम से कम
...............
तुम्हें इस तरह तो नहीं फटना था
इस कदर न झूमना था तुम्हें
तुम्हें भी नहीं मचलना था इस कदर
न रोना था तुम्हें इस बेकदरी से
उनकी खुराफातों की सजा हमें न देना था
ऐ बादल, ऐ दरख्तों, ऐ पर्वत, ऐ बरसा रानी
कम से कम तुम्हें तो रहम खाना था हम पर।
15.
रोकिए उन्हें
बंदिश न लगाइए
भावना,संवेदना,विवेचना
सबके सब आएंगे
आपके ही काम
फुदकने दीजिए
मचलने दीजिए
भरने दीजिए उड़ान
उनके पांवों में बेड़ी न डालिए
यह कम तो नहीं
कि वह शामिल है
दुखों को बांटने में
शब्दों के सहारे
कोई अपराध तो नहीं कर रहे
जो कर रहे हैं
रोकिए उन्हें, रोक सकें तो।
16.
रहम कीजिए
हमारे कमजोर कंधे
नहीं उठा सकते और बोझ
अपने शास्त्र को, अर्थ को
नीति को अनीति को
चाहे जैसे भी सुलझाए
हमको न उलझाएं

रहम कीजिए
हमको टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही
जीने दीजिए
नहीं कर सकते
कोई उपकार तो
हमें नहीं उसकी परवाह
रहम कीजिए
समझ नहीं पा रहे
विकास की परिभाषा
न ही इस सुधार-वुधार की भाषा
हमें तो जीने का
सीधा-सरल कुछ उपाय बताइए
महंगाई थोड़ा कम कर दिखाइए
हमें सब्जबाग न दिखाइए।
17.
बस तालियां...
तुमको तो प्यास लग गई
बहुत जोरों की
नापने को बाकी है
अभी
कोसों पसरी डगर
उबड़-खाबड़-कंकड़ीली

मन को थोड़ा समझाओ
काबू में रखे धैर्य को
तुम्हारी मंजिल अब भी दूर है पथिक
अभी तो भूख भी लगेगी कुछ कदम बाद
पानी की जरूरत तब ज्यादा होगी
उसे बचाए रखना
और हां, थक-हार कर
पहुंच न जाना वहां
नशे की घूंट
तुम्हारे पांवों को जकड़ लेगी
भनक भी न लगने देगी...
वे तालियां बजाएंगे तुम पर
बस तालियां।
18.
उतना ही वीभत्स
उबाल तो जरूरी है
खून एकदम ठंढ़ा पड़ जाए
यह बात भी ठीक नहीं
संवेदनाएं न कुलबुलाए
तो जिंदा होने पर शक भी है लाजमी
गुस्से का इजहार
जाए न बेकार
यह कामना
हर किसी का है अधिकार
पर जब समुद्री उफान
झील की शांति धारण कर ले
तो सोचिएगा
डूब कर अपने भीतर
कि एक क्रूरता के जवाब में
किस तरह की
क्रूरता की चाह हो सकती है हमारी
उससे भी ज्यादा या थोड़ा कम
पूछिएगा किसी दूसरे से नहीं
खुद से ही
ठीक रहेगा
ठीक रहेगा
वही करतूत
वही आचरण
जो वहशियों ने किए
यानी कि
उतना ही पाशविक
उतना ही वीभत्स!

19.
उसकी चाह
सुनता हैं
धड़कनें
सिसकियां
चीख-उल्लास
दिल से
नजर जब-तब
देने लगता है धोखा
मन की आंखों से
... देख लेता हैं
दीदें फाड़-फाड़
बंजर-सुखाड़
फैल रहे रिश्तों में
दिमाग बार-बार
जोड़-घटाव में
लग जाता है
तो एक युद्ध छिड़ जाता है
दिमाग के सीने पर
सवार हो जाता है दिल
फिर दिल का ही चलता है
दिल लिखना चाहता है
दिल की भाषा
दिल बोलना चाहता है
दिल की जुबान
दिल सुनना चाहता है
दिल की बात
चंद दिलों में
बस जाने का अरमान लिए।

20.
मुझे उतारो जमीन पर
वहां से
हर चीज दिखती है धुंधली
न पेड़
पेड़-सा लगता है
न पहाड़ पर्वत-सा
झील पोखर नजर आता है
और नदी नाले-सा
फूल तो कहीं दिखते ही नहीं
खुशबू की बात तो छोड़ ही दीजिए
और हां कोई चेहरा भी पहचान में नहीं आता
नहीं-नहीं मुझे और नहीं उड़ना
तुम्हारे असीम आसमान पर
चलो मुझे जमीन पर उतारो।

.........
21.
उम्मीद
शाख से जब झड़ते हैं पत्ते
पेड़ बहुत उदास नहीं होते
उन्हें होता है भरोसा
फिर से फूटेंगे कोंपल
फिर से खिलखिलाएंगे पखेरू
फिर से आ बैठेंगे
पथिक थोड़ा सुस्ताने
पतझड़ से नहीं घबराते पेड़
जड़ों में पनाह पा लेती है
उम्मीद उनकी।

22.
जिद उनकी
................
बहस से
बात बन नहीं रही
होती जा रही है
बखेड़े में तब्दील
जिद है उनकी
कि हम मान लें
उनकी बात चुपचाप
अपने विश्वासों के साथ
दगा करने की नसीहत
दिए जा रहे हैं लगातार।

23.
जब कभी
.............
चुप हो जाते हैं
कहकहा लगाते लोग

चहकते चेहरे
छुईमुई में हो जाते हैं तब्दील

वक्त आता है
जब कभी बोलने का
अन्यायी भाषा के खिलाफ।

24.
आ गए परदेशी
.....................
आ गए परदेशी
पता-पता, बूटा-बूटा
छा गए

कुहू-कुहू की तान
कानों के रास्ते
दिलों में समा गए

महक आम के
मोजर के
महुए के
सहजन के
घर-आंगन चमका गए।

25.
गर तुम न आते
....................
गर तुम न आते
मैं से हम बनने
यह मैं भी कहां
बन पाता हम
हमदम मेरे
गर तुम न आते
किससे मांगता साथ
किससे मांगता हाथ
हमदम मेरे
गिरते-पड़ते-भटकते कदमों का
किसी ठौर थमना न होता
संभलना न होता
अनिश्चितताओं का बीच
यह सिलसिला न होता
जिंदगी का।
मेरे हमराही
इस किताब के पन्नों का
उलटना-पलटना न होता
गर तुम न आते।

26.
सुपात्रा
..........
काली-सांवली
कम अक्ल बावली
किसे चाहिए
न लंगड़े को न लूले को
न लटकन को न झूले को
गोरा होना ही काफी नहीं
होनी चाहिए लंबी-छरहरी भी
नैन-नक्श भी तीखे हों
बोल-बात मीठे हों
पढ़ी-लिखी हो
हो स्मार्ट
बना लेती हो
मसालेदार चाट
यानी कि सुपात्रा हो
सर्वगुण संपन्न
ऊपर से
माल भी लाए टनाटन।

27.
मालूम नहीं
...............
हमारे कानों तक पहुंचती है
हंसी
कभी-कभी
चेहरे पर खिली मिलती है
खिलखिलाहट और ठहाके भी
दुर्घटनावश कभी-कभी
रुआंसे चेहरे
थरथराते जिस्म
कनखियों से भी दिख जाते हैं
अक्सर
विलापती आवाजें
लगातार पीछा किए जा रही हैं
हमारी
हम-आप सुन-देख लेते हैं
मालूम नहीं
उनके साथ ऐसा क्यों नहीं हो पाता।

28.
रीति
......
चल पड़ी है रीति
किस्तों की
खतरे में पड़ी बुनियाद
रिश्तों की।

29.
बदलेंगे वही
...............
जाग उठे हैं सोते से
जो रोते थे
बस रोते थे
किस्मत को कोसते
सोते थे
जाग उठे हैं
कुछ जाग उठे हैं
भय उनके अब भाग चुके हैं।
श्रम की ताकत जान चुके हैं
खुद को थोड़ा पहचान चुके हैं
बदलेंगे वही
मिजाज मौसम के
तोडेंगे वही जड़ताएं।

30.
तब
.....
पुचकारते हुए से
दुलारते हुए से
प्यारे-प्यारे
अस्त्रहीन
शब्द
कभी-कभी
अख्तियार कर लेते हैं
खंजर की शक्ल
अक्ल ठिकाने लगाने पर
जब हो जाते हैं आमादा।

31.
यकीन
........
दास्तां हम आपको
अपनी जुबानी
क्या सुनाएं
यकीन है कि
कुछ लब हरकत में
आएंगे जरूर।

32.
दीमकें
........
उनको
जाने कितनी ही
भाषाएं आती हैं
शायद, दुनिया की सारी की सारी
जिनमें लिखी गई होती हैं किताबें
वे उन्हें इस कदर डूब कर पढ़ती हैं
कि चाट जाती हैं।
( नरेश सक्सेना की दीमकें कविता पढ़ने के बाद)

33.
फैसला
.........
सुधिजनों की बैठक का
कुल जमा फैसला यह
कि उसे छोड़ दिया जाए
उसके ही हाल पर
भौंकने दिया जाए
न दिया जाए ध्यान
उसकी तरफ।

34.
संभावना
..........
यहीं कहीं बैठी होगी
दुपट्टा ओढ़ कर
इंतजार कर रही होगी
तनिक झांक-झांक
रख छोड़ी होगी आस
फिर भी
कि हो रही होगी तलाश
उसके आस-पास
वह कहीं भागी नहीं होगी।

35.

न जाने क्यों
................
भुलाए बैठे थे
उनसे मिलना हुआ
मुस्कराहट के साथ
गर्मजोशी से मिलाए हाथ
गले भी लगाया खींच कर
न जाने क्यों
दिल में कोई जुंबिश न हुई।









कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें