बुधवार, 28 जून 2017

कवि के साथ


कवि के साथ
हाल के दिनों तक बंगाल में इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती थी कि कविता लिखने पर किसी कवि को मुकदमे में फंसाया जा सकता है। धमकियों या आपत्तियों की बात दिगर है। लेकिन जो संभव नहीं था या जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी, वह अब होने लगा है।  एक कवि को कविता लिखने के अपराध में न केवल धमकियां मिलीं , उसके खिलाफ मुकदमा भी दायर किया गया। लेकिन संतोष की बात यह है कि समाज में आजाद कलम के पक्ष में खड़े होने वालों की भी कमी नहीं । यह भरोसे की बात समाचार चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया पर दिखी है। पिछले शनिवार को तो कोलकाता की सड़कें भी इसकी गवाह बनीं। बंगला कवि श्रीजात बनर्जी के बहाने कविता के हक में, यूं कहें कि अभिव्यक्ति की आजादी के हक में सड़क पर उतर आए कवि, लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी। कालेज स्क्वायर से धर्मतला के वाई चैनल तक निकाले गए उस जुलूस में देश में बढ़ती धार्मिक कट्टरता के खिलाफ नारे लगाए गए और कवि पर धार्मिक भावना पर चोट करने के गैर जमानती मामले को वापस लेने की मांग की गई। इस जुलूस में मंदाक्रांता सेन,अंशुमान कर, श्यामलकांति दास, शंकर चक्रवर्ती,रोशानारा मिश्र, किन्नर राय,समीर आईच, सनातन दिंदा, अरूणाभ गांगुली,सारण दत्त,इमानुल हक आदि शामिल हुए। इसमें अम्बिकेश महापात्र भी थे, जिन्हें कार्टून बनाने के अपराध में जेल जाना पड़ा था।जिसकी वजह से ममता सरकार की हर तरफ निंदा हुई थी। बाद में वे बेगुनाह करार दिए गए और उनकी मानहानि के एवज में ममता सरकार को जुर्माना भी अदा करना पड़ा था। लेकिन इस बार ममता जी भी कवि के पास खड़ी हैं। उनके परिवारजन की सुरक्षा के मद्देनजर एक सुरक्षा कर्मी को तैनात किया गया है।
जिस कविता को लेकर विवाद पैदा हुआ उसे 19 मार्च को श्रीजात ने फेसबुक पर पोस्ट किया था। दो दिन बाद विश्व कविता दिवस के दिन उन्हें पता चला कि उनकी कविता से हिंदू संगठन से जुड़े  एक शख्स की धार्मिक भावना को ठेस पहुंची है। इसलिए सिलीगुड़ी के उस नौजवान ने उनके खिलाफ  मुकदमा दर्ज कराया है । श्रीजात बनर्जी ने अपनी कविता में कब्र से निकाल कर बलात्कार करने की मानसिकता पर चोट की है । फेसबुक पर बारह पंक्ति की इस कविता को हजारों लोगों ने पसंद किया, प्रशंसा की तो बहुत सारे लोगों ने इसकी निंदा की और अश्लील टिपण्णियों के साथ कवि को धमकियां भी दी। बाद में विवाद को बढ़ते देख फेसबुक ने उस कविता को हटा दिया । इसको लेकर कुछ सज्जनों को आपत्ति थी। ये सज्जन लगातार उसे शिकायत पहुंचा रहे थे कि उस कविता से उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंची है, सो उसने अभिशाप शीर्षक वाली कविता को हटा दिया।
दिलचस्प इस तथ्य को जानना है कि जिस कविता पर  घमासान के मंजर सामने आए, उसे 19.03.2017 के सुबह 08.25 बजे तक 18 हजार से ज्यादा लोगों ने पसंद किया । 4622 लोगों ने साझा किया  और पक्ष-विपक्ष में हजारों लोगों ने टिप्पणियां की है। दरअसल, नाराज लोगों को कब्र से बाहर निकाल कर बलात्कार करने की मानसिकता पर सवाल उठाती इस कविता के आखिरी दो पंक्तियों से धर्म खतरे में पड़ता नजर आने लगा। इससे  उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची। यह संभव है। लेकिन इस पर बहस या  महज आपत्ति जताना पर्याप्त नहीं लगा। धमकियां भी काफी नहीं लगी। सो मुकदमा भी दायर कर दिया गया। श्रीजात को इससे पहले भी बांग्लादेश के ब्लागरों की हत्या के बहाने बढ़ती इस्लामी कट्टरता के खिलाफ कविता लिखने पर धमकियां मिल चुकी हैं। लेकिन इस बार मुकदमे का सामना करना पड़ा। बनर्जी की कविता से नाराज इन काव्य मर्मज्ञों को बारह लाइन वाली कविता के मूल स्वर से भी शायद दिक्कत हो, लेकिन इस पद पर ज्यादा गुस्सा है-
आमाके घर्षन कोरबे जदिन कबर थेके तुले
कंडोम पोराने थाकबे, तुमार उई धर्मेर त्रिशूले
 यानी कब्र से निकाल कर जितने दिन मेरा बलात्कार करना अपने धर्म रूपी त्रिशूल को कंडोम पहनाए रखना।
गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में हुई एक सभा में एक वक्ता अपने जोशीले भाषण में महिलाओं को कब्र से निकाल कर बलात्कार करने की बात करता है। इस भाषण का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है। इसी मानसिकता के खिलाफ यह कविता है। जाहिर है कि शर्मनाक और निंदनीय उस  इरादे से बड़ा गुनाह हो गया काव्यात्मक भाषा में कंडोम-त्रिशूल का इस्तमाल करना।
हालांकि, यह संभव है कि कवि की इस भाषा से हम सहमत न हो, पर इसी आधार पर किसी रचनाकार को मुकदमें में घसीटा जाना चाहिए। धमकियों की बौछार शुरू कर देना चाहिए बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़नी चाहिए। यह सोच लिखने-पढ़ने-बोलने की आजादी के रास्ते में बड़ा रोड़ा से कम नहीं। और कोलकाता या बंगाल को इस तरह की बंदिशें मंजूर नहीं। महज 42 साल के इस कवि के हिस्से कविता की दो दर्जन से अधिक किताबें हैं,कई संपादित किताबें हैं। सम्मानित आनंद पुरस्कार है, एक गीत के लिए हासिल फिल्म फेयर पुरस्कार है। भारी संख्या में पाठक हैं। सोशल मीडिया पर भी से जबरदस्त उपस्थिति है।  इनकी किसी भी पोस्ट पर औसतन चार हजार की पसंद, औसतन चार सौ का साझाकरण और टिप्पणियां भी सैकड़ों-हजारों में मिलती रही है। जाहिर है कि कविता अनुरागी समाज इस विवाद से दुखी और चिंतित है।  

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

चकाचौॆध का अंधेरा-एक

आदरणीय, प्रियवर,
नमस्कार। प्रकाशक जी ने संग्रह की अपेक्षित प्रतियां भेजी नहीं सो आपको भेज नहीं पाया। संग्रह  की कविताएं कम से कम आपकी नजर से गुजर ले, इस इरादे से ईमेल के जरिए आप तक पहुंचा रहा हूं। कृपया अपनी राय दीजिएगा दो-चार शब्द लिख कर।
सादर
शैलेंद्र शांत
1.
बेधड़क
..........
शब्दों को भी
आती है शर्म
सहमते हुए ही कहा-
माफ कीजिएगा
मैं किसी बाड़े में
नहीं रह सकता
घुटने लगता है
मेरा दम।
2.
चाह
......
चुप्पी ने कहा
शोर से
तुम जोर लगाओ
पुरजोर शोर मचाओ
मैं देखना चाहती हूं
असर तुम्हारे शोर का।
3.
सभी
.......
मैं तुम्हें नहीं कर पाऊंगा
स्थगित
तुम्हें मैं अपने हाथ-पांव दूंगा
तुम्हें दूंगा
सुरक्षित गर्भ
सहेज कर रखूंगा तुम्हें
तुम्हारे नन्हें हाथों के स्पर्श से
जुड़ा लिया करूंगा हृदय को
मेरी तृप्ति से निढाल होंगे सभी।
4.
हादसे
........
वजहें तलाश लीजिएगा
सुर्खियों में ब्यौरे हैं
बेशुमार बर्बादियों के
लूट कि जैसे मौलिक अधिकार
औरतें कि महज जिस्म हों जैसे
मौतें कि जैसे गिनतियां।
5.
वापसी
.........
बहके कदम
जब थक-हार जाते हैं
पछताते हैं
लौट आते हैं
उसी परिचित
इलाके में।
6.
शांति
.......
कहना बस इतना है
कि मिलना चाहता हूं
कहां मिलूं तुमसे
तुम ही बता दो
कि जहां भंग न होती हो
किसी की शांति, कहां मिलूं तुमसे
निर्जन वन में
विस्तृत रेगिस्तान में
अंतरिक्ष में
पाताल में
या सपने में
7.
चयन
.......
इस इलाके में
शब्द है
नाद है
संवाद है
और उस मुहल्ले में
धमकी है
नफरत है
उन्माद है
और है प्रमाद
आजादी है आपको
चाहे जिसे चुन लें।
8.
यदा-कदा
.............
अपराधियों पर
खीझ उतार लिया करते हैं
यदा-कदा
यदा-कदा
बगलगीर
हो लेते हैं
मौके की नजाकत को समझते हैं।
9.
शक
.......
एक मानसिक रोग है शक
मनोविज्ञान यह कहता है
फिर भी न करें शक
तो शक होने लगता है
कि पुर्जे सलामत तो हैं
दिल-दिमाग के
चीजें जहां होनी चाहिए
वहां से गुम गई हैं
फिर क्यों न करें शक
क्यों न करें सवाल
अपनी धुरी से तो
धरा भी नहीं छिटकती
जब खिसकती है जरा भी
तो आ जाता है भूचाल
पर दरपेश खौफनाक मंजर के बावजूद
जलजला दिलों में न आए
तो शक लाजिमी है
शक महज मानसिक रोग नहीं।
10.
समझदारी
..............
हम इनके मुरीद हैं
वह उनके
और वे हम दोनों के
अलग-अलग जब मिलते हैं
समझदारी इसी को कहते हैं।
11.
पछतावा
...........
मानवगंध
खींच लाते हैं निर्बंध
और तू चली आती है
बदलने स्वाद
और पा लेती है मुक्ति इहलीला से
क्या विसंगति है
हालांकि यह मंशा
नहीं हो सकती किसी की
कि मसल ही दे तुझे
बस यूं ही
जैसे कि मानो
कोई अस्तित्व ही न दे तुम्हारा
पर तेरे डंक की चुभन भी
क्या कम होती है
फिर कोई क्यों न तिलमिलाए
पछताए, वह भी पछताए
तुझे मसल कर।
12.
जैसे कि स्त्री
................
बेमतलब की बातों में
न वक्त दिखता है
न उसका नासूर
इसीलिए हुजूर
अक्सरहा खामोश रहते हैं
वक्त जरूरत
जरूर बोलते हैं
जब दिल से निकलती है पुकार
तो हो जाते हैं लाचार
वरना खामोश ही रहते हैं
ज्वाला सीने में
धधकने दिया करते हैं
कमोवेश पीड़ा
चुपचाप सहते हैं
जैसे कि सहती जाती है स्त्री।
13.
तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं
...........................................
दो कदम हम जो चले
तुम भी चले
साथ-साथ
थके-हारे
जब भी लौटा
तुम्हारे पास
तुमने ही न टूटने दिया विश्वास
सब की नजरों में गिर चुका था जब
तुमने न छोड़ा साथ
मैं नहीं तुमने ही
तुमने ही
संभाला मुझे
पाला मुझे
यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं
डूबते को तिनके का
एक मात्र भरोसा थी तुम
पीछे लौटता हूं जब कभी
तुम्हारे बहुत करीब पहुंच जाता हूं।
14.
कम से कम
...............
तुम्हें इस तरह तो नहीं फटना था
इस कदर न झूमना था तुम्हें
तुम्हें भी नहीं मचलना था इस कदर
न रोना था तुम्हें इस बेकदरी से
उनकी खुराफातों की सजा हमें न देना था
ऐ बादल, ऐ दरख्तों, ऐ पर्वत, ऐ बरसा रानी
कम से कम तुम्हें तो रहम खाना था हम पर।
15.
रोकिए उन्हें
बंदिश न लगाइए
भावना,संवेदना,विवेचना
सबके सब आएंगे
आपके ही काम
फुदकने दीजिए
मचलने दीजिए
भरने दीजिए उड़ान
उनके पांवों में बेड़ी न डालिए
यह कम तो नहीं
कि वह शामिल है
दुखों को बांटने में
शब्दों के सहारे
कोई अपराध तो नहीं कर रहे
जो कर रहे हैं
रोकिए उन्हें, रोक सकें तो।
16.
रहम कीजिए
हमारे कमजोर कंधे
नहीं उठा सकते और बोझ
अपने शास्त्र को, अर्थ को
नीति को अनीति को
चाहे जैसे भी सुलझाए
हमको न उलझाएं

रहम कीजिए
हमको टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही
जीने दीजिए
नहीं कर सकते
कोई उपकार तो
हमें नहीं उसकी परवाह
रहम कीजिए
समझ नहीं पा रहे
विकास की परिभाषा
न ही इस सुधार-वुधार की भाषा
हमें तो जीने का
सीधा-सरल कुछ उपाय बताइए
महंगाई थोड़ा कम कर दिखाइए
हमें सब्जबाग न दिखाइए।
17.
बस तालियां...
तुमको तो प्यास लग गई
बहुत जोरों की
नापने को बाकी है
अभी
कोसों पसरी डगर
उबड़-खाबड़-कंकड़ीली

मन को थोड़ा समझाओ
काबू में रखे धैर्य को
तुम्हारी मंजिल अब भी दूर है पथिक
अभी तो भूख भी लगेगी कुछ कदम बाद
पानी की जरूरत तब ज्यादा होगी
उसे बचाए रखना
और हां, थक-हार कर
पहुंच न जाना वहां
नशे की घूंट
तुम्हारे पांवों को जकड़ लेगी
भनक भी न लगने देगी...
वे तालियां बजाएंगे तुम पर
बस तालियां।
18.
उतना ही वीभत्स
उबाल तो जरूरी है
खून एकदम ठंढ़ा पड़ जाए
यह बात भी ठीक नहीं
संवेदनाएं न कुलबुलाए
तो जिंदा होने पर शक भी है लाजमी
गुस्से का इजहार
जाए न बेकार
यह कामना
हर किसी का है अधिकार
पर जब समुद्री उफान
झील की शांति धारण कर ले
तो सोचिएगा
डूब कर अपने भीतर
कि एक क्रूरता के जवाब में
किस तरह की
क्रूरता की चाह हो सकती है हमारी
उससे भी ज्यादा या थोड़ा कम
पूछिएगा किसी दूसरे से नहीं
खुद से ही
ठीक रहेगा
ठीक रहेगा
वही करतूत
वही आचरण
जो वहशियों ने किए
यानी कि
उतना ही पाशविक
उतना ही वीभत्स!

19.
उसकी चाह
सुनता हैं
धड़कनें
सिसकियां
चीख-उल्लास
दिल से
नजर जब-तब
देने लगता है धोखा
मन की आंखों से
... देख लेता हैं
दीदें फाड़-फाड़
बंजर-सुखाड़
फैल रहे रिश्तों में
दिमाग बार-बार
जोड़-घटाव में
लग जाता है
तो एक युद्ध छिड़ जाता है
दिमाग के सीने पर
सवार हो जाता है दिल
फिर दिल का ही चलता है
दिल लिखना चाहता है
दिल की भाषा
दिल बोलना चाहता है
दिल की जुबान
दिल सुनना चाहता है
दिल की बात
चंद दिलों में
बस जाने का अरमान लिए।

20.
मुझे उतारो जमीन पर
वहां से
हर चीज दिखती है धुंधली
न पेड़
पेड़-सा लगता है
न पहाड़ पर्वत-सा
झील पोखर नजर आता है
और नदी नाले-सा
फूल तो कहीं दिखते ही नहीं
खुशबू की बात तो छोड़ ही दीजिए
और हां कोई चेहरा भी पहचान में नहीं आता
नहीं-नहीं मुझे और नहीं उड़ना
तुम्हारे असीम आसमान पर
चलो मुझे जमीन पर उतारो।

.........
21.
उम्मीद
शाख से जब झड़ते हैं पत्ते
पेड़ बहुत उदास नहीं होते
उन्हें होता है भरोसा
फिर से फूटेंगे कोंपल
फिर से खिलखिलाएंगे पखेरू
फिर से आ बैठेंगे
पथिक थोड़ा सुस्ताने
पतझड़ से नहीं घबराते पेड़
जड़ों में पनाह पा लेती है
उम्मीद उनकी।

22.
जिद उनकी
................
बहस से
बात बन नहीं रही
होती जा रही है
बखेड़े में तब्दील
जिद है उनकी
कि हम मान लें
उनकी बात चुपचाप
अपने विश्वासों के साथ
दगा करने की नसीहत
दिए जा रहे हैं लगातार।

23.
जब कभी
.............
चुप हो जाते हैं
कहकहा लगाते लोग

चहकते चेहरे
छुईमुई में हो जाते हैं तब्दील

वक्त आता है
जब कभी बोलने का
अन्यायी भाषा के खिलाफ।

24.
आ गए परदेशी
.....................
आ गए परदेशी
पता-पता, बूटा-बूटा
छा गए

कुहू-कुहू की तान
कानों के रास्ते
दिलों में समा गए

महक आम के
मोजर के
महुए के
सहजन के
घर-आंगन चमका गए।

25.
गर तुम न आते
....................
गर तुम न आते
मैं से हम बनने
यह मैं भी कहां
बन पाता हम
हमदम मेरे
गर तुम न आते
किससे मांगता साथ
किससे मांगता हाथ
हमदम मेरे
गिरते-पड़ते-भटकते कदमों का
किसी ठौर थमना न होता
संभलना न होता
अनिश्चितताओं का बीच
यह सिलसिला न होता
जिंदगी का।
मेरे हमराही
इस किताब के पन्नों का
उलटना-पलटना न होता
गर तुम न आते।

26.
सुपात्रा
..........
काली-सांवली
कम अक्ल बावली
किसे चाहिए
न लंगड़े को न लूले को
न लटकन को न झूले को
गोरा होना ही काफी नहीं
होनी चाहिए लंबी-छरहरी भी
नैन-नक्श भी तीखे हों
बोल-बात मीठे हों
पढ़ी-लिखी हो
हो स्मार्ट
बना लेती हो
मसालेदार चाट
यानी कि सुपात्रा हो
सर्वगुण संपन्न
ऊपर से
माल भी लाए टनाटन।

27.
मालूम नहीं
...............
हमारे कानों तक पहुंचती है
हंसी
कभी-कभी
चेहरे पर खिली मिलती है
खिलखिलाहट और ठहाके भी
दुर्घटनावश कभी-कभी
रुआंसे चेहरे
थरथराते जिस्म
कनखियों से भी दिख जाते हैं
अक्सर
विलापती आवाजें
लगातार पीछा किए जा रही हैं
हमारी
हम-आप सुन-देख लेते हैं
मालूम नहीं
उनके साथ ऐसा क्यों नहीं हो पाता।

28.
रीति
......
चल पड़ी है रीति
किस्तों की
खतरे में पड़ी बुनियाद
रिश्तों की।

29.
बदलेंगे वही
...............
जाग उठे हैं सोते से
जो रोते थे
बस रोते थे
किस्मत को कोसते
सोते थे
जाग उठे हैं
कुछ जाग उठे हैं
भय उनके अब भाग चुके हैं।
श्रम की ताकत जान चुके हैं
खुद को थोड़ा पहचान चुके हैं
बदलेंगे वही
मिजाज मौसम के
तोडेंगे वही जड़ताएं।

30.
तब
.....
पुचकारते हुए से
दुलारते हुए से
प्यारे-प्यारे
अस्त्रहीन
शब्द
कभी-कभी
अख्तियार कर लेते हैं
खंजर की शक्ल
अक्ल ठिकाने लगाने पर
जब हो जाते हैं आमादा।

31.
यकीन
........
दास्तां हम आपको
अपनी जुबानी
क्या सुनाएं
यकीन है कि
कुछ लब हरकत में
आएंगे जरूर।

32.
दीमकें
........
उनको
जाने कितनी ही
भाषाएं आती हैं
शायद, दुनिया की सारी की सारी
जिनमें लिखी गई होती हैं किताबें
वे उन्हें इस कदर डूब कर पढ़ती हैं
कि चाट जाती हैं।
( नरेश सक्सेना की दीमकें कविता पढ़ने के बाद)

33.
फैसला
.........
सुधिजनों की बैठक का
कुल जमा फैसला यह
कि उसे छोड़ दिया जाए
उसके ही हाल पर
भौंकने दिया जाए
न दिया जाए ध्यान
उसकी तरफ।

34.
संभावना
..........
यहीं कहीं बैठी होगी
दुपट्टा ओढ़ कर
इंतजार कर रही होगी
तनिक झांक-झांक
रख छोड़ी होगी आस
फिर भी
कि हो रही होगी तलाश
उसके आस-पास
वह कहीं भागी नहीं होगी।

35.

न जाने क्यों
................
भुलाए बैठे थे
उनसे मिलना हुआ
मुस्कराहट के साथ
गर्मजोशी से मिलाए हाथ
गले भी लगाया खींच कर
न जाने क्यों
दिल में कोई जुंबिश न हुई।









jin mitron ko sangrah nahin bhej paya, unake liye-bhag do

36


सांझ को उतरना है
.........................
सांझ को उतरना है
उतरना है उसे
आसमान से
पर्वतों से
उतरना है उसे
ऊंचे-ऊंचे दरख्तों से
बहुमंजिली इमारतों से
भींगते हुए
कंपकंपाते हुए
धूल उड़ाते मौसम में
लतरों से
उतरना है उसे
कभी जल्दी
कभी देर से
रात को गले लगाने का वादा
निभाना है उसे...

37.
कबूल
........
शाख से टूटे हुए गुल
कर लो इस बात को कबूल
कि रूप पर अपनी
तुमको था बहुत गरूर।

38.
तकलीफ होती है
.......................
तुम कहो तो छोड़ दूं
ऊंची उड़ान भरना
भटकना अनंत आसमान में
फुदक लिया करूं आसपास
जितना भी मिल जाए
धरती-आकाश
मान लूं प्रारब्ध
पर मेरे डैने न तोड़ना
जब कभी करते हो
उन्हें ऐंठने की कोशिश
तकलीफ होती है
तुम कहो तो
रातें गुजार दूं
जाग-जाग कर
भूले से न देखूं कोई सपना
पर सुबह के सूरज को
देखने के साथ-साथ
पंख फड़फड़ा लेने की
इजाजत चाहूंगा जरूर
जितना भी चुग लूं
दाना-तिनका
जी लूंगा
जागते हुए भी न देखूंगा कोई सपना
इसका यकीन दिलाता हूं तुम्हें
सपने टूटने से
बड़ी तकलीफ होती है।

39.
कमाल
..........
कितना भरा-पूरा
गझिन-गझिन
हरीतिमा सुशोभित माथा
उस पर खिलते
झूम-झूम मिलते
हल्के-पीले
सादा-शर्मिले
महकते मह-मह मोजर
खुशबू तोड़ती सारे बंधन
चहकते पंछी चह-चह
कुकती कोयल कु-हू-कु
खूब-खूब खिला पलाश
टह-टह लाल
मतवाला हुआ महुए का मन
फुदकते बुलबुल-मैने
सब के सब
करकश काक भी लगे प्यारा
कभी इस टहनी
कभी उस डाल
करता धमाल
पुलकित रोम-रोम सबका
वसंत का देखो यह कमाल।

40.
ग्रास
......
डुबकी लगाओ तल में
फिर लौट आओ सतह पर
सीखो करतब नए-नए
करो भरोसा गति पर अपनी
बस यहीं बची है आस
छोटी मछली-छोटी मछली
वरना बन सकती हो ग्रास
कभी भी, बड़ी की।

41.
जोर
......
देखो तो
किस तरह मचाता था शोर
बन गया मुंहचोर
कैसे
बेजुबान न बनिए
मान लीजिए, मान लीजिए
खन-खन खनकते सिक्के का
है बड़ा जोर।

42.
सस्ता
........
डीजल महंगा
बिजली महंगी
महंगा खाद और पानी
महंगे बीज, कीटनाशक
सस्ता बस खून-पसीना
जो खेतों में बहता है।

43.
जुराब मुंह पर..
बंधु, सुनते हैं इन दिनों
पागलखाने में भी
पड़ने लगी जगह की कमी है
जैसे कि दिलों में
वैसे, इस धरा पर
मौजूद है अब भी
इफरात जगह
कानून की किताबों में
धाराएं बहुत-बहुत सी
और लोकतांत्रिक बंदूकों में
बेशुमार गोलियां
ईंट-पत्थरों की कमी तो
वैसे भी नहीं रही अपने सभ्य समाज में
अपने दिमाग को मत करना खराब
देखते रहना धत्त-कर्मों को चुपचाप
या फिर मुंह फेर लेना
और हां डाले रखना मुंह पर जुराब।

44.
अनमोल
............
देखा अल सुबह जो सपना
बताया हर्षित
हमदम ने कहा-मिलेगा धन
मिलता है धन-कहते तो यही हैं
सपने में देखा जो मल-वल
धन तो नहीं मिला
नहीं थी इसकी कोई संभावना
पर आ टपकी
एक-दो कविता
झोली में मेरी
अरे वाह
यह धन ही तो है-
अनमोल।

45.
न जाने क्यों
...............
कह कर कुछ
विचार करने को जी चाहता है
कुछ कह लेने के बाद
न जाने क्यों
लिख कर कुछ
काट देने को जी चाहता है
बार-बार
पढ़ कर
भुला देने को जी चाहता है
अक्सर
न जाने क्यों।

46.
जीवनगाथा
..............
इस कथा में समाहित है
अनगिनत कहानियां
उपकथाए-
घृणा की, प्रेम की
सुख-दुख की अनंत
कोई भी थक जाए
कोई ना पार पाए
इसे सुनाते हुए
सीख-सबक
हर-एक में प्रविष्ट
कहीं से शुरू करें
किसी की भी बांच लें।

47.
कथोपकथन
................
दो टके की तो छोड़िए
छिटांक भर की भी औकात
नहीं बन पाई है आपकी
एक ने दूसरे से कहा
यह दीगर है बात
कि आपने मालें खूब उड़ाई है
पहले ने भी मुनासिब नहीं समझा
चुप रहना
अपने शिखर परिंदों के
कथोपकथन को सुन रहे थे
चूजे चुपचाप
चकित-चकित।

48.
गरीबी
..........
एक से लिखो
दूसरे से मिटा दो
फिर लिखो
फिर मिटाओ
खेलो यह खेल
चाहे जितनी बार
तुम खेल सकते हो
बेरोक-टोक मनपसंद
यह खेल
तुमसे भला कौन
छीन सकता है
वह पेंसिल
वह रबर।

49.
सफाई की तमीज
निचोड़ने से पहले
भिंगो कर रखते तो
गुनगुने पानी में
थोड़ी देर
सर्फ-साबुन को करने देते
उनका काम
धोबिया पाट भी
भला इस कदर क्या देना
कि किसी जिस्म के काम ही न आ सके कमीज
मुफ्त की सलाह आपको
जाकर सीखिए किसी गृहणी से
सफाई की तमीज।

50.
बदस्तूर
जमात में
शामिल थे जब तक
जमे थे अंगद के पांव की तरह
विमुग्ध इस कदर
कि हंसे जा रहे ते
गदहे की हंसी
ताल ठोंकते ऐसे
कि जीत ली हो कोई बड़ी जंग
हालांकि सोहरत में उनकी
शामिल थीं जो कथाएं
उनमें तोड़फोड़, हुढ़दंगई का
एक लंबा सिलसिला था
जो कभी थमा ही नहीं।
51.
उद्गार
थोड़ा खाते हैं
थोड़ा ही पीते हैं
ताल नहीं ठोकते
मर्जी से अपनी
मगर जीते हैं
हम आपके ही आंगन के
हरे-हरे पपीते हैं।

52.
चकाचौंध का अंधेरा
..........................
चकाचौंध का एक अंधेरा है
गहरा, बहुत गहरा
गहन, घनघोर
वहां कभी नहीं होती भोर
जो छूट जाते हैं
सो छूट जाते हैं
वहां तक न नरेगा पहुंचता है
न अंत्योदय जैसी कोई
लोक-हितकारी योजना
चकाचौंध के नशे की खुमारी
टूटती है बहुत देर से
तब तक आसमान
आ चुका होता है
अमावस की चपेट में
पृथ्वी को ही
भुगतनी होती है सारी पीड़ा
यानी कि उसके वाशिंदों के मार्फत
जिन्हें होता है इंतजार
पूर्णिमा का
पर आमावस की रातें
होती हैं बड़ी लंबी
जिसमें दम घुट जाता है
बहुत-बहुत ताकतवर लोगों के भी
चकाचौंध के अंधेरे की
कोई भोर नहीं होती।

53.
सहारा
..........
छत पर चला गया था
घबरा कर
बिजली गुम गई थी
जाने कब आती
आसमान में भी छाई थी
डरावनी शक्ल के साथ कालिमा
हालांकि तारे टिमटिमा रहे थे-
जरूर
तभी देखा टूट कर गिरते
कई तारों को-
बहुत दूर
जहां भी गिरे होंगे
बेचारे
धरती ने उन्हें
निश्चित ही दिया होगा
आंचल का सहारा
टूटते सपनों को
यह भी नहीं नसीब।

54.
गांधी के बंदर
...................
जो देख सकते हैं
देखना नहीं चाहते
जो बोल सकते हैं
बोलना नहीं चाहते
जो सुन सकते हैं
सुनना नहीं चाहते
बहुत समझदार हो गए हैं
गांधी जी के बंदरों।

55.
तब
......
इत्यादि-इत्यादि
जब खास हो जाते हैं
उनकी नजर में भी
तब सबकुछ बकवास हो जाता है।

56.
कला
.......
थोड़ी आनी चाहिए
न आती हो तो सिखनी चाहिए
कलावादी होती जा रही दुनिया में
रंग भरने की
छंदों से खेलने की
सुर और ताल
संवाद संप्रेषण की
कैमरे को मूव करने की
रस-छंद-भाव की...
नहीं-नहीं
मैं इन कलाओं की बात नहीं कर रहा।

57.
गुनाह
.........
काम उनके किसी
आ न सके
यह था एक गुनाह
कि सर को पावों तक
ले जा न सके
कि दिन को रात बता न सके
सूखे को कादा कैसे कहता
जाने भी दीजिए
कितनी लंबी फेहरिस्त पेश करूं
गुनाहों की
बस, अफसोस इस बात का
कि खुद को लट्टू बना न सके।

58.
अब देर न कर
...................
कहां छुप गया रे सूरज
निकल कोहरे को भेद
तन-मन को किए जा रहे हैं अचल
बहा जा रहा है पवन विकल
शीतदंश के मारे
ठिठुरे जा रहे हैं बेचारे
अनगिनत, करते मिन्नत
निकल चुपके से ही
बादलों की ओट से
अब तो निकल
त्रस्त हैं जो व्यवस्था की खोट से
दे-दे उनको अपनी झलक
जरूरत उनको कुछ ज्यादा
तेरी अनुकंपा की
बनी हुई है आशा
अब तक न ढेर हुई
अब देर न कर
निकल, दिखा अपना मुखड़ा।
59.
कि होती है कोई और बात
...................................
शिखर की होती है कोई धुरी
होनी चाहिए उसकी कोई धुरी
नजर आता है इन दिनों कोई शिखर
हिमालय की तरह ऊंचा किए माथा
चलिए यह पता किया जाए
कि शिखर जब अपनी धुरी से छिटकता है
तो क्या वह नतीजे से वाकिफ होता है
शिखर जब बहकता है
तब क्या वह शराबियों का सा
करने लगता है आचरण
या लगता है भौंकने
आवारा चौपाए की तरह
काट खाने का कर लेता है इरादा
या कर लेना चाहता है इससे भी कुछ ज्यादा
अच्छा, धुरी से छिटकना
कैसे बन जाती है उसकी मजबूरी
क्या उसे सताने लगता है डर
शिखर से उतर जाने का
कि होती है कोई और बात।
60.
बिटिया ने डांटा
....................
ओह
दाल में इतनी सारी हल्दी
क्यों डाली
नमक भी क्या
डाला है ज्यादा
ओह
इतने सारे आलू-प्याज
क्यों काटे
किसने कहा था सानो
कर दिया न गीला आटा
मम्मी नहीं तो क्या हुआ
मैं तो थी घर में
बच्चों की सी हरकत
क्यों करते हो पापा
बिटिया ने डांटा।

61.
तिनका
........
कैसे बने सहारा
किसी का
कोई डूबता हो
चाहे उतराता
क्यों गढ़ी
किसने गढ़ी
यह कहावत
उसके नाम
उकसी समझ में नहीं आता।

62.
पुनर्नवा
..........
सुलगी तो धुआं-धुआं
दहकी तो आग-आग
पड़ी ठंडी तो राख-राख
लकड़ी ने साथ निभाया
पतंगों को भगाया
व्यंजनों को पकाया
बर्तनों को चमकाया
घूरे से पहुंती जब खेतों में
घुल-मिल गई माटी से
पा लेती है एक नई शक्ल
माटी से।

63.
धारक
........
लूट भरी जेबों से
रक्त सने हाथों से
सम्मानित होना
कितना है सम्मानजनक
कितना मारक
कोई और क्यों
कोई गैर क्यों
खुद ही विचार करे धारक!

64.
बनिस्बत
............
बहुत लिखे
कम लिखे
खुशी लिखे
गम लिखे
लिखे थोड़ा सच
थोड़ा गपशप लिखे
कलम जो भी लिखे, अच्छा
चुपचुप रहने से बहुत अच्छा।
65.
काम की चीज
....................
कविता के सागर में डुबकी लगाओ
तो डूबने सा लगता है बहुत कुछ
जैसे कि निराशा
जैसे कि संताप
जैसे कि लोभ-कामनाएं
तरह-तरह की वासनाएं
शमन करती जाती है बड़े प्यार से
हौले-हौले
कविता होती है बड़े काम की चीज।
66.
गिरे भी तो
..............
जो गिर चुके हैं
बहुत-बहुत नीचे
उन्हें कोई और क्या गिराएगा
वे आसमान से गिरे
कि छत से
कि खजूर से
क्या फर्क पड़ता है
हकीकत तो यही
कि वे गिर चुके हैं
गिरे भी तो
नाले में
कुएं में
दलदल में
पास ही में
बह रही थी नदी
वे उसमें नहीं गिरे
उनको बहुत कुछ पाना था
और जल्दी-जल्दी।
67.
आजादी
...........
थोड़े से आबाद हुए
बहुत सारे बरबाद
आजादी जिंदाबाद।
68
आत्मकथा
(कवयित्री सुकीर्ति गुप्ता के स्मरण में)
..............
यह चाहना भी
कोई चाहना हुआ
पर उसने यही चाहा
चाहने वाले तो
बहुत कुछ चाहते हैं
जैसे कि घरबारी
पर्याप्त धन
कि जैसे पूंजीपति
एक और कारखाना
कि जैसे नेता
मंत्री की कुर्सी
कि जैसे पत्रकार
संपादक का ओहदा
कि जैसे संपादक
राज्यसभा की सदस्यता
कि जैसे कलाकार
तालियों की गूंज
कि जैसे.....
पर वह चाहता था
कि छप जाए वह किताब
जिसमें लिखा था उसने
जिंदगी का हिसाब-किताब
बताना चाहता था
कुछ राज की बातें
खोलना चाहता था कुछ भेद
हालांकि जानने वाले
जान चुके थे
बहुत सारी बातें
जो उसे भी नहीं पता था
उसने सौंप दी थी पांडुलिपि
उत्साही प्रकाशक को
और खुद चला गया था बहुत दूर...
69.
गुमसुम बैठे थे बातुनी
............................
चुभती हुई सी
कोई बात थी
और पसरा हुआ था-
सन्नाटा
दूर-दूर तलक
फलक पर
बेशुमार परिंदे थे
पर उनके पंखों की फड़फड़ाहट
कहीं गुम थी
हंस-खिलखिला रहे थे
मंद-मंद मुस्करा रहे थे
जंतु कुछ खास-खास
गुमसुम-गुमसुम
बैठे थे बातुनी।
70.
उसके सीने पर सवार थी इमारत
............................................
मछलियां बार-बार
ऊपर आ जाती थीं
और पलट कर
गोताखोर बन जाती थीं
इस छोर, उस छोर
कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में
बैठे थे बंसी डाले
और उधर उस छोर पर
बैठे थे कुछ जोड़े
अपनी सुध खोए
और उस ओर बर्तन साफ कर रही थीं
कुछ औरतें, उन्हें ताकती-मुस्करातीं
कुछ बच्चे सीख रहे थे तैरना
और कुछ बड़ी होतीं बच्चियां
छीटें मार रही थीं एक-दूसरे पर
तभी अचानक दृश्य से गायब हो गए थे सब के सब
लाल हो चुका था तालाब का पानी
कुछ लाशें भी दिखी थीं तैरती हुईं
लाशें दिखीं तो बंदूकें चलने की
आवाजें गूंजने लगी थीं कानों में
(यह सत्तर के दशक के न्याय की इबारत थी)
वह तीसरी मंजिल के एक दड़बे में सो रहा था
सोते से हड़बड़ा कर उठा तो पाया
कि वहां न मछलियां थीं
न बंसी वाले
न जोड़े, न औरतें, न बच्चे
न बड़ी होतीं बच्चियां
वह तालाब भी नहीं था वहां
वह तो भेंट चढ़ चुका था
विकास की वेदी पर
उसके सीने पर सवार थी तीन मंजिली इमारत
जिसमें सो रहे थे लोग गहरी नींद
वह जो जागा था अभी-अभी
लाशों को देख घबरा गया था बुरी तरह!
71.
गेहूं के दाने
कितने कतरे खून के सूखे
कितना बहा पसीना
कितनों के घर कर्ज में डूबे
कितनों को परिजन पड़े गंवाने

वे क्या जाने
वे क्या जाने
कुछ बेदर्दी ले गए औने-पौने में
भरने अपने खजाने
कुछ ले गए गोदामों उन्हें सड़ाने
मंत्री-अफसर और क्या करते
देते रहे सफाई
बनाते रहे बहाने
इस मंजर को देख
तड़पे दिल उनका
जिनको पड़े उगाने
गेहूं के दाने।
72.
संदिग्ध
काटिए दांतों से
चाहे जीभ पर रखिए
तनिक सा, सिलवट पर पिसी
उस चीज को
जिह्वा तालू  से टकराएगी
और मुंह से निकलेगी
टक-टक की आवाज
खट्टा-छट्टा ही होगा
उसका स्वाद
डिब्बे से निकाल कर
पानी में घोला गया जिसे
मधु-मधु ही होगा
बेशक-बेशक
थोड़ा कम या थोड़ा ज्यादा
उसका स्वाद
छोटी हो चाहे बड़ी
हरा हो चाहे हो रंग उसका लाल
दिखाती है एक सा ही कमाल
तीखा तीखा तीखा
आंखों से टपक पड़ता है पानी
तलब भी पैदा कर देती है उसकी
यही तो है उसकी रंगत, उसका स्वाद
और आपका
73.
उसका आना
चुपके से आती है
अचानक चली आती है
बगैर पूछे, बगैर बताए
कई-कई बांधों को तोड़
वक्त-बेवक्त ले जाती है
अपने साथ भींचे
कभी ट्रेन से फेंक देती है बाहर
कभी खींच लेती है पटरियों के नीचे
पांव खुद-ब-खुद फिसल जाते हैं
पर्वत चढ़ते हुए
फंदे से लटका देती है
तो कभी किरासन छिड़क देती है देह पर
न जाने कितने बहाने बना लेती है
गढ़ लेती है न जाने कितनी कहानियां
जहर भी भला कोई
खाने-पीने की चीज होती है
पर उतार देती है एक झटके से
हलक के नीचे
जर-जोरू-जमीन के मोह-माया से
बिलगा कर उनकी काया से
ले जाती है अपने साथ
पैदल-पैदल न जाने कहां।
74.
खुशनसीबी
..............
वह महफिलों, जलसों, सेमिनारों से अलग
एक दुनिया थी
वहां छोटी-छोटी बातें थीं
छोटी-छोटी कथा-कहानियां थीं
बेहद सहज, सरल लोगों की दुनिया में थे
छोटे-छोटे सुख-दुख
वासनाएं भी थीं छोटी-छोटी
मेरी खुशनसीबी
कि मैं घिरा था
उस दुनिया के
सीधे-जटिल
बाशिंदों से
मेरी खुशनसीबी
कि मेरी आवाजाही
बराबर बनी रही
उस दुनिया में
वह एक अलक्षित दुनिया थी
वह एक समांतर दुनिया थी
यह कुबेरों और उनके चाकरों से
लगभग खाली-खाली एक दुनिया थी
उसी ने हाथ थामा
उसी ने दिया पानी
लड़खड़ाई जब गिरहस्ती
सूखे जब कंठ
संवेदनाओं के ठेकेदार
वहां दूर-दूर तक नहीं दिखे।

75.
थमे की कोईगति नहीं
तुम चलोगे तो
पांवों से चिपकेंगे धूल
कीचड़ भी चिपक सकते हैं
यदा-कदा
ठोकर लग सकती है
हो सकते हैं लहूलुहान
तुम्हारे पांव
तुम चलोगे तो
यह सब होगा
कुछ न कुछ तो होगा
हो सकता है
कि डंडे भी पडें
तुम्हारे पांवों पर
और जकड़ दिए जाएं
जंजीरों में
पर तुम्हें चलना होगा
थमे की कोई गति नहीं।
76.
नियोजन
हम तो लड़खड़ाते रहे
गिरते-पड़ते रहे
संभलने की हर कोशिश के बावजूद
हम भरे-पूरे कुनबे से ऊबे तो कहा-
ठीक है,मान लेते हैं-
बस दो या तीन बच्चे
होते हैं घर में अच्छे
पर हमसे कहा गया
कि बात बन नहीं रही
मुसीबतें कम नहीं रहीं
सो थोड़ा और सुधर जाएं हम
बन जाएं थोड़ा और जिम्मेदार
हमने कहा-ठीक है सरकार
यह भी लेते हैं मान
कि अगला अभी नहीं
दो के बाद कभी नहीं
इतने पर भी बात बनी नहीं तो
लिया हमारे आत्मजनों ने मान
कि अगला बच्चा अभी नही
एक के बाद कभी नहीं
फिर भी तो मुसीबत कमी नहीं
महंगाई सुरसा थमी नहीं।
अब कौन सा करें उपचार
कौन सा नियोजन!

77.
उनको कहां पता था
गर्वित थे
सीख कर हुनर
डूब-डूब कर
खूब-खूब
करते हुए भरोसा

हाथों के हुनर से
नहीं बढ़ता है देश आगे
पीछे छूट जाता है
उनको कहां पता था
कि जब आता है विकास
तो बदल जाता है मतलब
हास-परिहास का
उनको कहां पता था
हास को हंस के पंख लग जाते हैं
हाथ पर धरे हाथ
बैठे तकते हैं
सुनी आंखों से आकाश
हुनरमंद हाथ
और उनकी तरफ
ईश्वर भी नहीं देखता
पलट कर
उनको कहां पता था।
78.
इतने तो
...........
इतने तो अविश्वसनीय
न हुए थे कभी
अर्थहीन न हुए थे
न हुए थे कभी
इतने बेअसर
बुजदिल न हुए थे
बेअसर-बीमार न हुए थे
न हुए थे इतने हल्के
बेशर्मी में न हुए थे
इतने अव्वल

बचाओ, ऐ शब्दकारो!
अर्थ खोते शब्दों को बचाओ!
79.
सपने में संवाद

अब तो मुश्किल हो गया है यह काम
कुछ और कठिन श्रीमान
हर तरफ कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं
और सबके सब पर काबिज हैं महासचिव
बौने-बौने मृगछौने
‘क्या ट्रेजडी है...!’
कि तोड़ते-तोड़ते
कि लगभग आपकी ही भाषा में 
गढ़ों और मठों को
बन बैठे हैं उन्हीं के पोषक
मंचों पर विराजमान संचालक-उद्घोषक
और अब उनकी पालिटिक्स यह है श्रीमान
कि उनकी पैंतरेबाजी पर गिरगिट भी हैं हैरान
और यह दौर है बगलगीर हो जाने का
कुछ भी नहीं खोने का
बस पाने ही पाने का
उनको लुभाने का
जिनके थैलों में हैं-
तरह-तरह के प्रमाणपत्र-पुरस्कार
चतुर सुजान नहीं हैं अनजान
कि उनके थैलों में हैं उपेक्षा के नुकेले पत्थर
और स्वाभिमानियों को नेस्तनाबूद कर देने के
दूसरे औजार भी
सो, श्रीमान
कुछ और मुश्किल हो गया है यह काम।



सोमवार, 12 सितंबर 2016

कतार


कतार
चुनाव के बाद वाला दिन था। बैंक में जबरदस्त भीड़। बेचारे कई बूढ़े यानी बुजुर्ग भी कतार में। कुछ आगे वाले सज्जन को बता कर सोफे या कुर्सी पर विराजमान। ऐसे ही एक भद्र वरिष्ठ नागरिक से मैंने पूछ लिया-कैसे हैं?
इरादा वक्त काटने का भर का था।
उन्होंने कहा -भालो आछी (ठीक हूं)।
वह सज्जन बंगला भाषी यानी बंगाली थे।
-‘अकेले आए हैं?’
-‘हें...(हां)’
-‘आपना के तो चीनते पाड़छी ना...’( आपको तो पहचान नहीं पा रहा)
उन्होंने मुझे गौर से देखा।
-‘तो क्या हुआ, थोड़ी बातचीत करें, वक्त कटेगा। कतार देख रहे हैं न?... बहुत देर तक इंतजार करना पड़ेगा नंबर आने का।’
-‘हां, ठीक बोलचेन...’
-‘अच्छा, बुरा मत मानिएगा, आपकी उम्र क्या होगी?’
-‘आसीर काछा-काछी ’(अस्सी के करीब)।
-‘वाह, लगते नहीं है...’
-‘पेंशन पाई तो, जा खुशी खाई, योग कोरी, हाटी, आड्डाबाजी
कोरी...’(पेंशनधारी हूं, पसंद की चीजें खाता हूं, योग करता हूं, टहलता हूं, गप्पे मारता हूं..)
-‘बहुत अच्छा। ऊपर वाला, हर बुजुर्ग को ऐसा ही सुअवसर दे...’
वह मुस्करा रहे थे। मैंने बस यूं ही उनसे पूछा - ‘अच्छा यह तो बताइए आपने अब तक के जीवन से क्या सबक पाया?’
-‘जेब खाली न होने दो, खुद को स्वस्थ रखो...’
उनके बगल में बैठे एक सज्जन हमारी बातें गौर से सुन रहे थे। उनसे भी चुप नहीं रहा गया।
-हां, वह गाना सुना है न?-बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया..और हां, सेहत का भी ख्याल जरूरी है...
-‘दरअसल,भगवान बहुत आलसी हो गया है। वह सरकारी नौकरों की तरह शायद घूसखोर भी हो गया है। वह जिनको बुलाना चाहिए बुलाता ही नहीं। हम बुजुर्गों को देखता कौन है। बच्चे अपने में मस्त हैं, पड़ोसी अपने में। तरह-तरह के रोग है, असविधाएं हैं, तकलीफें हैं, किसी से किसी का मतलब ही नहीं। और उधर भगवान सोया हुआ है...’
यह एक बीच में टपके एक दूसरे भद्र मानुष थे।
-‘हम लोगों से तो अच्छे पशु-पक्षी हैं, कुत्ते-बिल्ली हैं, न धन-दौलत की चिंता, न घर-परिवार की, न राशन की दुकान की, न बाजार की और न ससुरी राजनीति की...’
बीच में मेरे एक परिचित भी आ टपके। बिना मांगे अपनी इच्छा भी सुना दी-‘मैं तो अगले जन्म में कुत्ता बनना पसंद करूंगा। आदमी तो कत्तई नहीं।’
-‘अरे बाप रे, यह क्या कह रहे हैं मास्टर साहब? कितने दुरदुराए जाते हैं बेचारे, जिसे देखो वहीं ईंट-पत्थर -डंडे दे मारता है...’
-‘पर खाने-पीने की, पहने-ओढ़ने की घर के तमाम झमेले तो उन्हें नहीं झेलने होते...’
-‘दादा, कुत्ता बनना ही चाहते हैं तो उत्तम प्रजाति वाला बनिएगा। कोई चिंता नहीं रहेगी,मेम साहबों की गोदी में मजे कीजिएगा’-यह एक दूसरे बुजुर्ग का हस्तक्षेप था हमारी वार्ता में। इस पर ठहाके जमकर लगे।
हंसते हुए मैं कतार में लग गया। वह आगे बढ़ रही थी...
कतार आगे बढ़ रही थी, लेकिन चीटीं की गति से। पर वह लंबी भी होती जा रही थी अपने हनुमान जी की पूंछ की तरह। सो सोफे - कुसिर्यों पर बैठे लोग उठ-उठ कर कतार में लग भी रहे थे। इसे देख एक रोगीनुमा बुजुर्ग हड़बड़ी से उठे तो उनका पासबुक गिर गया, इस पर उनका ध्यान भी नहीं गया तो मेरे ही मुंह से निकल पड़ा - ‘अरे, दादा अपनी जान का तो ख्याल रखिए, देखिए वह फर्श पर पड़ी है।’
बेचारे, पीछे मुड़ कर पासबुक को देखा तो उस पर लगभग झपट से पड़े। मेरे पास आए और कांधे पर हाथ रख आभार जताया।
-‘आप सही कह रहे हैं दादा, अब तो यही जान है-सहारा है।’
वे बातों-बातों में ही बता गए कि उनके दो बच्चे हैं। दोनों अपनी दुनिया में मस्त। एक किसी लड़की के साथ रिलेशनशिप में है और उस पर ही अपनी कमाई लुटाए जा रहा है। उनकी एक बिटिया भी है, जिसकी शादी के लिए उन्हें बहुत सारे पापड़ बेलने पड़े, अब उसे जैसे अपनी मम्मी-पापा से मतलब ही नहीं रहा। ‘बाबा-बाबा’ की रट लगाने वाली बिटिया को अपने पापा से फोन पर भी बातचीत के लिए वक्त नहीं..
मास्टर साहब भी हां में हां मिला रहे थे और बता रहे थे कि अब तो जीने की इच्छा भी खत्म हो चुकी है। पर ऊपर वाला बुलाता ही नहीं।
सामने कतार में ही दो बच्चियां थीं। हमारी बातों को सुन मुस्करा रही थीं। बीच-बीच में लंबी कतार की वजह से ऊब का इजहार भी कर रही थीं। मैंने उनसे कहा- ‘अरे तुम लोग अब घर लौट जाओ, दूसरे दिन आ जाना। कब तक खड़ी रहोगी।’ उसमें से एक ने कहा-‘पिता जी आ जाएं तो हम चले जाएंगे।’ बाद में पता चला कि वह पड़ोस के एक परिचित की बिटिया है और उसी के लिए उसके पापा पैसे जमा करेंगे। वे कतार से बाहर खड़े थे। मैंने कहा, ‘आज तो मुश्किल है’ तो उन्होंने बिटिया की ओर इशारा कर दिया।
-‘अच्छा तो यह आपकी बिटिया है?’
पता चला कि वह बीए में है। यानि कि....?
मैंने खुद को संभाला, नहीं-नहीं, उधर मत ले जाओ ध्यान...मंजर बदलने वाला नहीं। पिता को धन जुटाना ही होगा। वर्षों पाल-पोस कर दूसरे घर पठाना ही होगा। फिर वही कहानी- दुख सहो और फिर किसी को दुख दो। न जाने कब से यही कहानी दोहराई जा रही है....
एक, दो, तीन ,चार..हां अब चार ही लोग रह गए थे मेरे आगे, पीछे बहुत सारे। निश्चित ही सबकी- होगी अपनी-अपनी कहानी । चेहरे पर हंसी बिखेरने वालीे और आंखें गीली करने वाली भी।
अरे, यह क्या मेरी आंखों के कोर गीले क्यों होने लगे। अभी-अभी तो मैं लोगों को हंसाने-छेड़ने में लगा था...ताकि वक्त कटे... यादें पीछा न करें, पर यह संभव भी तो नहीें...कतार में खड़ी बच्ची को देख अपनी प्यारी बिटिया याद आ गई थी। इसी तरह मेरे लिए वह कतार में लग जाया करती थी, वहां जाने से पहले पापा का कितना ख्याल रखती थी...नहीं, पापा उसे जरूर याद आते होंगे-मम्मी भी...
-दादा, कहां खो गए आपका नंबर आ गया। पीछे वाले हम-उम्र ने कांधे पर हाथ रख कर फुसफुसाया।

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

पानीनामाःएक इकरारनामा
बचपन
पानी का मचलना है
यौवन
पानी का चढ़ना है
बुढ़ापा
पानी का उतरना है
पानी ही आशा है
पानी ही भरोसा।
पानी
जब भूख से तड़पता है
दरार-दरार फट पड़ते हैं पहाड़
पानी की प्यास बढ़ते ही
खंड-खंड टूटने बिखरने लगते हैं तटबंध
डूबने लगते हैं पठार भी
कछार भी।
पूरा का पूरा जीवन
एक पानी से आना है
दूसरे पानी में
समाना है।
कोटि-कोटि देवालयों से पटे
मेरे प्राणप्यारे देश भारत में
मंडराता है आज पानी का संकट
पानी का संकट
यानी
जीवन का संकट।
अलग-अलग इलाकों के जलस्रोतों पर
इलाकाई हुक्मरानों ने
बैठा रखे हैं
कहीं बाघों के
कहीं लठैतों के पहरे।
बंधुओं!
हमने तो जाना है आजतक
ठोस या द्रव
जीवन
एक अनंत प्रवाह है पानी का
पूरा का पूरा ब्रह्मांड
एक खिलौना है
पानी का
उगना और डूबना भी
बुदबुदा है पानी का।
पढ़ा है पुराणों में
सुना है कथाओं में
विष्णु के नख
ब्रह्मा के कमंडल
शिव के जटाजूट से
फूंटती
अजस्र जलधाराओं के बारे में
होता रहा हूं प्रणत बार-बार
नदियों और ताल-तलैयों के तट पर।
सागर-महासागर की उदात्तता से
होता रहा अभिभूत मैं
पंडित संत प्रसाद मिश्र और
राजपति देवी का इकलौता
ध्रुवदेव मिश्र पाषाण।
बंधुओं!
जिंदगी की चादर समेटने का वक्त
करीब आती बेला में
फूटना आह्वान मेरे अंतस से
पानी को बेपानी मत करो
पानी ही प्रलय है
पानी ही सृजन
पानी ही उल्लास है
पानी ही क्रंदन।
सम्मुख है एक प्रश्न-
जांगर का पानी समूचा ही सूख जाय
गंगा में पानी की जगह
भगीरथ का खून बहे
शस्य-श्यामल धरती का आंचल
चीथड़ों में बिखरने लगे
क्यों न चुल्लू भर पानी में
इससे पहले डूबें वे
जो सरेआम उतारते हैं
भारत की बेटियों का पानी
चीखते हुए भारतमाता की जय।
जब भी जुड़ते हैं
पानी के प्रणाम में मेरे हाथ
जब भी झुकता
मंदिर में देव प्रतिमा के सामने
मेरा माथ
हिंडोले झुलाने लगती हैं
बिह्वलता की स्थिति में
नर्मदा के बेटे
भवानी भाई की पानीदार कविताएं
पानी की तलाश में
रेतीली दौड़ में शामिल
पगलाते-हांफते मिरगे को
दिलासा देती
बरहज के सरजू-तटवासी कवि
मोती बीए की पंक्तियां-
तनी अउरी दउर मिरगा
पा जइबे किनारा
प्रयाग के संगम से चल कर
हुगली के तट पहुंचे
छविनाथ मिश्र की हिंदी-ऋृचाएं
प्यास से सूखते हलक वाले राजस्थानी
रेत फांकते रेत में ही नहाते
हरीश भदानी के गीतों में फूंटी
दारुण व्यथा कथाएं।
सोचते हुए पानी के बारे में
याद आती है मुझे
बलिया की गंगा के बेटे केदारनाथ सिंह की
पानी से घिरे लोगों के बारे में कविता
सोचता हूं
काश!
लिख पाएं वे आज
पानी के अभाव में सूखते कंठों की पीड़ा।
पता नहीं
सौर-मंडल के किस सूरज का ताप
सोख रहा है मनासरोवर को
उल्टी दिशा में कहां भारी जा रही
हंसों की जमात?
किस सुदिन के राज का प्रताप यह
भव्य-भारत की धरती पर भगवान?
खेत-खेत बिछ रहे
भूख-प्यास से बिलबिलाते-मरते
पशुओ के कंकाल
गिद्धों के अघाने के दिन आए क्या?
पानी के लिए महाभारत के ब्यूह में फंसते वक्त
तैरती है आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ
आजादी की खून-पसीने की पानीदार लड़ाई।
याद आता है साबरमती का लाल
महानायक वह
जो कर सकता था सत्याग्रह नमक के लिए
जो डांट सकता था पंडित जवाहर लाल को
बाल्टी भर पानी अधिक ढरक जाने पर
जो रहता था फिक्रमंद
सीखचों के भीतर
सीखचों से बाहर
गरीब-गुरबा
दीन-दुखी
कोढ़ी, अपाहिज के लिए
उसी का नाम था
मोहनदास करमचंद गांधी
कहा जिसे अखंड भारत ने
गदगद कंठ से बापू-हमारा बापू
कहा हिंदू ने-कहा मुसलमान ने
कहा सिक्ख ने-कहा इसाई ने
कहा सत्री ने-कहा पुरुष ने
बच्चों ने कहा-जवानों ने कहा
बूढ़ों ने पुकारा
बापू, हमारा बापू
हिमालय की हवाओं ने कहा
हिंद महासागर की लहरों ने कहा
बापू, हमारा बापू
पूरे राष्ट्र ने कहा
राष्ट्रपिता उसे।
मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की बावड़ी से उपजे
बवंडर में भटकते-
लिखते हुए आज यह कविता
गांधी के हत्यारे के लिए
होते हुए पानी-पानी
डुबकी लगाते हुए
हिंद महासागर के अतल में
सोचता हूं
और है क्या कोई
जो समाए गांधी जैसा
जन-जन के मन में
बताएंगे आज क्या
सत्ता के नायक
पानी यदि जीवन से विदा हुआ
पानी यदि देश का उतर गया
तब फिर
किसके लिए लाएंगे प्रभू
आप अच्छे दिन अपने?
तुले हैं आप क्यों
एक अच्छे-भले मुल्क को बनाने पर
मिलावटी जानलेवा जिंसों से भरा
मोदीखाना
काशी के अस्सी घाट पर
रघुवीर से माथो पर तिलक लगवाते
संत तुलसी के सखा रहीम ने
चेताया था-
रहिमन पानी राखिये
बिन पानी सब सून
पानी गये न ऊबरे
मोती, मानुष, चून।
जहां-जहां
फुंकारता है कालिया नाग
पानी-पानी घोलता हुआ जहर
वहां-वहां
चुनौती है
कन्हैया के पौरुष को।
टुकड़ा-टुकड़ा बादलों को
बिन बरसे भटकते देख
ऊपर की ओर चोंच उठाए चातक की नजरों में है
एक सवाल
क्या गुजर जाएगा यों ही इस बार भी
स्वाति नक्षत्र सूखा का सूखा?
आखिर होगी खत्म कब
आर्त्त प्रतीक्षा?
पूछता हूं
लातूर और बुंदेलखंड की प्यास से
छटपटाते हुए
रुंधे-रुंधे कंठ से
परम पुनीत मातृ-भूमि के
तृष्णादग्ध भवितव्य की आहट से
आतंकित मैं-
धरती का हित भूल गए शायद
निराला के भाव-शिशु विप्लव के वीर बादल
नहीं सुन रहे वे गुहार कृषक अधीर को।
सन्नाटे के विवर में
चक्कर काटता है प्रश्न-
आने भी देंगे क्या
सत्ता के संप्रभु
अपने जाने से पहले
पानीदार लोगों के लिए
पानी भरे अच्छे दिन?
पितरों का तर्पण
आंसू से करने के दिन आएंगे क्या
देवभूमि भारत में
हे भारत-भक्त?
धर्मों के अखाड़ों में
क्या तय करेंगे
धर्माध्यक्ष
पहलवान
पानी के महाभारत के पैंतरे?
धर्म के हाथों त्रिशूल
महजब के हाथों छूरा
अशोक और अकबर के मुल्क का
मुकद्दर कितना बुरा?
सुनेगा कौन अब
कवि शमशेर का अमन राग
खांडव-दहन की लपटों से बुझेगी क्या
धरती के सूखते हलक की प्यास?

गुरुवार, 23 जून 2016

कारवां बढ़ता रहे

कारवां बढ़ता रहे
शैलेंद्र
इन दिनों कविता को लेकर कुछ साहित्य प्रेमी लोगों को कुछ ज्यादा ही चिंता हो चली है। इसको लेकर गैर कवियों को ही नहीं सुकवियों को भी चिंता होने लगी है। अच्छी कविताएं लिखने का दावा करने वालों की चिंता इस बात लेकर बढ़ी है कि बुरी कविता ने उनकी अच्छी कविताओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। वे कहीं कविता की आतंकारी भीड़ में खोती जा रही है। मंचीय कविता तो पहले से ही लिखी-पढ़ी-छपी जाने वाली कविता पर सितम ढाती रही है, इधर पत्र-पत्रिकाओं में बेशुमार छपने वाली बुरी कविताओं ने भी गजब ढाना शुरूकर दिया है। यानी इसने अच्छे, चर्चित, प्रसिद्ध सुकवियों की कविताओं के सामने पहचान का संकट पैदा हो गया है। रद्दी, खराब या बुरी कविताओं की भीड़ में उनकी अच्छी-कालजयी कविताएं गुम हो जा रही हैं। पाठक तो उन्हें पहचान ही नहीं पा रहे हैं। अच्छी-बुरी की शिनाख्त की तमीज तो उनमें है नहीं, उस पर आलोचक बंधु भी पाठकों के कान नहीं पकड़ रहे हैं। उन्हें बता नहीं रहे कि भैये ये रहीं अच्छी कविताएं, इन्हें ही पढ़ो। यानी अमुक-तमुक को ही पढ़ो। संपादकों के भी बीच-बीच में कान-वान पकड़ते। कहां-कहां से ढूंढ लाते हो भई इतने कवि-कविताएं। काहे फैलाते हो भई अपसंस्कृति। यह तो सांस्कृतिक अपराध है-इतना भी नहीं समझते। हम और हमारे सुकवि जिनके नाम सुझाएं-उनको ही छापा करो बारी-बारी। सीधी-सपाट, किसी के भी समझ आने वाली पंक्तियां भला कविता हो भी कैसे सकती हैं। वह कविता भला अच्छी हो भी कैसे, जिसे समझने में आलोचक या खुद कोई सुकवि मदद न करे।
ग्यारह राज्यों की भाषा, जिसे पुरे देश में 60-70 करोड़ या इससे भी ज्यादा पढ़ने या समझने वाले लोग हों, उस भाषा में 500-1000 या इससे भी कम प्रतियां छपने वाली पत्रिकाओं के मूढ़ संपादकों को कविता की तमीज ही नहीं सो बुरी कविता छापे चले जा रहे हैं। ये लघु पत्रिका निकालने वालों का तो कविता के बिना काम ही नहीं चलता। कुछ सिरफिरे प्रकाशक हैं, जो बहुत सारे बुरे कवियों की बुरी कविताओं की किताबें छापे चले जा रहे हैं। भले ही वे 200-300 प्रतियों के संस्करण हो।
ये लोग बाजारू या बड़ी पूंजी से निकलने वाले पत्रओ-पत्रिकाओं से भी सबक नहीं लेते। वहां कितने प्रेम से कविता ही क्यों, पूरे साहित्य को हाशिए पर धकेल दिया गया है। फैशन, प्रसाधन, फिल्मी गपशप, टीवी समाचार, खेल, मंत्र-तंत्र, राशिफल आदि की जगह कविता या साहित्य के लिए जगह क्यों जाया करनी चाहिए। यहां के संपादक कितने समझदार हैं। वे अच्छी-बुरी के चक्कर में फंसते ही नहीं। समझदारी का ही नहीं, समय का भी यही तकाजा है कि इसी तरह के ज्ञान बढ़ाऊ गद्य छापे जाएं, जैसा कि वे छाप रहे हैं। अच्छी कविता के पुजारियों को बाकी चीजों से भला क्या लेना-देना।
बेहतर होता कि बुरी कविताओं से ऊबे लोग यह लिख-पढ़ कर बताते कि ऐसे लिखी जाती है अच्छी कविता। हमारे आलोचक बंधु भी कोई तरकीब बता देते या कुछ अच्छी कविताएं लिख कर बतौर नजीर पेश करते, जिससे बुरी कविता लिखने वाले कुछ सबक लेते।
दरअसल, काव्य-लेखन दृष्टि, अहसास व अभ्यास का भी मामला है। कलात्मक साधना के साधक अपनी साधना में लगे रहें, इस पर भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पर बेबसी, बेचैनी और गुस्से से भरे माहौल में धीर-गंभीर कविता कम ही जन्म लेगी। अधीरता के संवेग से निकली कविता से वही अपेक्षित है, जो तर्कसंगत भी लगे। फूल, पत्तियां, बहार, जीवन-मृत्यु के रहस्य की जगह लोक के लौकिक और कभी न खत्म होते दिखने वाले जीवन-संघर्ष-विसंगतियों की चर्चा जब कविता में होगी तो उसमें सपाट बयानी भी होगी और आड़ी-तिरछी अपूर्ण-सी लगने वाली पंक्तियां भी, जो आंखों-दिलों में चुभती हैं, लिखी जाएंगी। दिल्ली बलात्कार कांड पर या ऐसी ही किसी वीभत्स वारदात पर कविता लिखी जाएगी तो उसमें धीरता की चाह कवि और कविता पर ज्यादती होगी। प्रतिक्रिया और प्रतिरोध की भाषा सपाट, आक्रामक और मुखर ही होगी। ऐसा होना समय की मांग होती है। कलात्मक अभिव्यक्ति की मालाजाप अराधना कम।
इस सवाल का जवाब हमें तलाशना ही चाहिए कि कविता में बौद्धिकता की बोझ कितनी होनी चाहिए। क्या इतनी कि वह साहित्य के साधारण पाठक को संप्रेषित ही न हो पाए और पाठक पत्रिका या किताब के पन्नों को पलटते हुए कहीं और कूच कर जाए। दरअसल, वह कविता किसी काम की नहीं जिसे सिर्फ और सिर्फ कवि या फिर उसका चहेता आलोचक या संपादक ही समझ पाए। सहज संप्रेषित कविता को कमजोर या बुरी कविता कह कर नाक-भौं सिकोड़ने का कोई मतलब नहीं।
हिंदी में कविता के ऊफान से ऊबे लोगों को बंगला, मराठी, मलयालम, तमिल, असमिया के कवितामय संसार को भी देखना चाहिए। कविता से यहां प्रेम का रिश्ता है, ऊब का नहीं। यहां सैकड़ों की संख्या में कविता की पत्रिकाएं निकल रही हैं। अपने कोलकाता में पुस्तक मेले में लघु पत्रिकाओं के लिए सम्मान के साथ जगह दी जाती है। बड़ी संख्या में कवि-कवयित्रियां कविताएं सुनते-सुनाती हैं। कविता पुस्तकों का लोकार्पण होता है। कवि-कवयित्रियों की कविताओं की आवृति होती है। यहां लगने वाले लघु पत्रिका मेले में पांच-छह दिन डेढ़-दो सौ कवि अपनी कविताएं सुनाते हैं। दूसरों की सुनते हैं। यहां नए-युवा कवियों को गर्मजोशी से स्वागत किए जाने की परंपरा है। नए धीरे-धीरे मंजेंगे इस उम्मीद के साथ। रद्दी-बुरी-खराब का रोना यहां कम ही है।

मंगलवार, 7 जून 2016

(बेतरतीब किस्सा-1)


माता जी यानी अम्मा के बक्से से मिली जन्मकुंडली के मुताबिक अपन 60वें में दाखिल हो चुके हैं। होश संभालने के बाद हाथ लगी इस कुंडली से पता चला कि अपन सात महीने पहले पैदा हो चुके थे दस्तावेजी तारीख से। यानी पांच अक्तूबर 1956 को। सर्टिफिकेट में दर्ज है पांच मई 1957। आपको मालूम ही होगा कि तब अस्पतालों से प्राप्त जन्म-प्रमाणपत्र स्कूली दाखिले के लिए अनिवार्य नहीं था। पिताश्री या अभिभावक जो बता देते वही सही मान कर स्कूल के रजिस्टर में दर्ज कर लिया जाता था। यानी उस परंपरा के निर्वाह दस्तावेजी कागजों में होता रहा। पर सच तो यही है कि छह अक्तूबर 2015 से अपन 60वें में दाखिल हो गए। पचपन में बचपन के बाबत कुछ नहीं लिखा-कहा, तो अब 60वें में बीते दिनों के कुछ लमहों को याद कर लेते हैं।
शायद 14-15 साल के होते-होते शेरो-शायरी, फिल्मी गानों के असर ने तुकबंदी की ओर मुझे आकर्षित किया। प्रकृति और प्रेम ही मेरी तुकबंदियों के आधार थे। स्कूली पढ़ाई में ‘...चेतक बन गया निराला था,’ ‘ ...वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलों’, ‘चंदन विष व्यापै नहीं’, ‘मन ही राखो गोय...’ जैसी कविताओं, दोहों ने प्रभावित तो किया था, पर रानू, गुलशन नंदा, समीर आदि के साथ ही कर्नल रंजीत जैसों के उपन्यासों, फिल्मी प्रेम कहानियों ने, गीतों ने ज्यादा प्रभावित किया। समाज में आस-पास भी किस्से ही किस्से बिखरे पड़े थे, जिनमें प्रेम के तत्व कुछ ज्यादा थे। फिल्मी परदे पर राजेश खन्ना अवतरित हो रहे थे। फिल्मी गीतों का असर तब किस पर नहीं रहा होगा। सो तुकबंदियों में उनका असर कैसे न पड़ता। ‘दूर नगर में बसे मेरे प्रीतम, याद उनकी सताती है...’ किस्म की तुकबंदियों का असर 20वें साल तक रहा। इरादा कहानियां बुनने का भी रहा और दुखांत किस्म के उपन्यास लिखने का भी, कुछ स्याही खर्च भी हुए इस बाबत, लेकिन न कोई कहानी मुकम्मल बनी न उपन्यास ही आगे बढ़ा। बस तुकबंदियों का सिलसिला जारी रहा। ‘चांद तुम पर्वत के पार न जाना...’, ‘ये कैसा न्याय है भगवान, कोई रो रहा है, कोई हंस रहा है...’, ‘आंखें तुम्हारी झील सी, कैसे न डूब जाता मैं...’
वह चौहत्तर-पचहत्तर के दिन थे। कादम्बिनी में नए कवियों के लिए प्रवेश नामक एक स्तंभ निकला करता था। कई मर्तबा उसके लिए कविताएं भेजी, पर छपी नहीं। ‘निहारिका’ या ‘सुषमा’ में एक प्रेम कहानी भी लिख भेजी। पर वह भी छपी नहीं। निराशा तो जरूर हुई होगी, पर कुछ न कुछ, कभी-कभार कापियों में दर्ज करता रहा। 1976 में जब आगे की पढ़ाई के लिए तब के बिहार और अब के झारखंड से उत्तर प्रदेश के पैतृक निवास वाले जनपद जाना हुआ तो राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक यथार्थ से मुठभेड़ ने गैर-बराबरी, जात-पांत, शोषण-उत्पीड़न की तरफ ध्यान खीचना शुरू कर दिया। वहीं ‘दिनमान’, ‘सारिका’ में दिलचस्पी पैदा हुई। कमलेश्वर, दुष्यंत कुमार, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि के साथ-साथ कामरेड़ों में भी दिलचस्पी पैदा हुई। गरीबी, सामंतवाद, पूंजीवाद, शोषण मुक्त समाज जैसी बातों के मर्म को समझने की किताबी कोशिश भी शुरू हुई। और वहीं कुछ सपाट, अनगढ़ कविताएं लिखी और कुछेक गजलनुमा तुकबंदी भी। पहली कविता बलिया के एक साप्ताहिक में छपी। साप्ताहिक का नाम था-कुटज। अपने अग्रज की तरह और मित्रवत रहे हरिबंश जी तब उसका अनौपचारिक संपादन करते थे। उन्हीं की पहल से यह कविता छपी थी। अक्षर-अक्षर जोड़ कंपोजिटर ने इसका फ्रूफ निकाल कर दिखाया था। पन्ने पर अपनी पहली कविता को दर्ज देख धड़कनें तेज हो गई थीं। मन खुश तो हुआ ही होगा। पर कंपोजिटरों में भी गजब का उत्साह था। शायद यह उत्साह मिठाई को लेकर ज्यादा था। उस दिन मिठाई तो नहीं, चाय-समोसे का दौर जरूर चला था। वह आयोजन हरिबंश जी की तरफ से ही हुआ था। कविता का शीर्षक था-झगरू का मुर्दा। इसमें न्याय-व्यवस्था और सामंती मानसिकता पर सवाल उठाया गया था। उस समय वहां से ‘रससुलभ’ नाम की पत्रिका निकालते थे नरेंद्र शास्त्री। वे कवि-कहानीकार थे। पेशे से अध्यापक। सारिका, धर्मयुग में उनकी कहानियां छप रही थीं। वहीं अपने विनय बिहारी सिंह से जान-पहचान हुई थी। बाद में उनसे दिल्ली में भी मिलना हुआ। और 1991 में तो हम जनसत्ता में आ गए। बलिया में भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से बीए में पढ़ते वक्त ही हुई थी। वे उसी किराए के मकान में रह कर पढ़ाई और नौकरी की तैयारी कर रहे थे, जिसमें मैं भी अपने अनुज के साथ रहता था। वे भी कविताएं लिखते थे और ‘आज’ वगैरह में छप भी रहे थे। गोष्ठियों में भी जाया करते थे। गीत-गजलों का शौक डा. राजेंद्र भारती को था, सो ‘रससुलभ’ को अपनी तरह से सभी मदद करते थे। यह भी तब ट्रेडिल मशीन पर छपती थी। हम रोज पता करने पहुंच जाते कि कितने पेज कंपोज हुए। ...
(बेतरतीब किस्सा जारी रहेगा)