शुक्रवार, 25 मार्च 2022

श्रम और संबंधों को तरजीह देती कविताएं

 बलभद्र

श्रम और संबंधों को तरजीह देती कविताएं

इस कवि की कविताओं से छिट-पुट मुलाकात होती रही है। हिन्दी के अलावा भोजपुरी में भी लिखते हैंं। इनकी कविताओं में श्रम को मान देने की झलक मिलती रही है। पहली बार उनके  संग्रह की कविताओं से गुजर कर पता चला कि रिश्तों को तरजीह देने की कई कविताएं भी हैं कवि के पास। दादा,पिता,मां आदि को बहुत आत्मीय ढंग से याद किया गया है। बाबा की चिरई, माई की घर-गृहथ्ती, स्नेह ममत्व, पिता की जीवटता-समर्पण मन को मोहने, द्रवित करने का काम करती जाती हैं। इसी तरह फसल काटती मजूरन, साइकिल से कोयला ले जाते लोग,ईंट पाथने वाले, आदीवासी औरत आदि पर कविताएं भी। कविता संग्रह का नाम है-' समय की ठनक' । इसे लोकायत प्रकाशन ,वाराणसी ने छापा है। आलोचक गोपाल प्रधान ने इस पर लंबी भूमिका लिखी है।कवि का नाम है बलभद्र। पेशे से आचार्य हैं। जसम जैसे संगठन से जुड़े हुए। जाहिर है, प्रतिरोध का स्वर को भी जगह है इसमें। गोपाल प्रधान सही कहते हैं कि बिहार के भोजपुर का संघर्षशील इलाका कवि का अपना इलाका है, लेकिन उनकी संवेदना उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। वे अपने इस सुपरिचित संसार को लांघकर भूगोल के मामले में नए इलाकों की यात्रा करते हैं....किसी कुशल छायाकार की तरह उन्होंने मेहनत से जुड़े ढेरों बिंब साधे हैं। उनके बिंबों में गति है।
यह सच है। उनकी कई कविताएं इसकी गवाही देतीं हैं। जैसे कि रोपनहारिनें को ही देखें-

रोपनहारिनें
बड़े ही विश्वास के साथ
दूधमुँह थाती को सौंप थकी उम्र को
आँगन से दिनभर की मुहलत माँग
छतनार आकाश की छाँव तले
अपने अथक श्रम सीकरों से
हरियाली रचने के व्रत के साथ निकलती हैं रोपनिहारिनें
चेहरे पर मेहनत की मटमैली चमक
बोली में रहर की ढेंढियों-सी खनक
मेड़ों पर पछुआ की ठसक ठिठोली
गीले अहसासों से गदरायी धरती
लचक गये पाँव
धसक गयी मेंड़, थोड़ी
सुगबुगाये घास-फूस
पास के महुवे से फड़क उठीं चिड़ियाँ
झेंप गईं हँसकर अल्हड़ रोपनिहारिनें
उमड़-घुमड़ घटाएं
बरसा गईं रिमझिम
जुड़ा गया तन-मन
हवा की थापों पर थिरकी दिशाएं
निहाल हुए हल के हत्थे पर पलभर सुस्ताते हलवाहे
मन ही मन कुपित सूरज
उगलने लगा आग देखजर्रू-सा
अदहन हुआ पानी
युद्धक्षेत्र-सा तनी रही खेतों में जिद्दी रोपनिहारिनें
कभी धूप कभी छाँव के साथ
सीमित में सिमटे बीचड़ों को
देती हैं संभावना और विस्तार
हवा के झोकों से झालर मारते नन्हे नन्हे पौधे
मुँह और पीठ किस दिशा में हों
मुड़ेंगी कलाइयाँ किस कोण से
कब गाएं, सुस्ताएं कब, कैसे--
हवा के रुख को खूब पहचानती हैं रोपनिहारिनें
धरती के पिछड़े हिस्से पर ही सही
जहाँ जमीन और मर्यादा एक मकसद है
जहाँ आकार ले रहा है बदलाव
अपने गीतों से धरती को जगाती
फुफकारते विषधरों के
हर फन का माकूल प्रतिरोध करती हैं रोपनिहारिनें
धरती की धूसर चूनर पर अंकित
अथक शब्दों में
श्रम की अंतहीन गाथा, जिसे
बांचती हुई पुरखों की जन्मपत्री
उसके अंजाम तक पहुंचाएंगी रोपनिहारिनें
......
बड़की माई (बड़ी मां)कविता ग्राम्य समाज की पूरी तस्वीर को ही पेश कर देती है- पढ़ी जाए यह-

बड़की माई
तब यह मकान बड़ा था
इसमें दस कमरें और दो निकास थे
एक सीढ़ी घर और एक शौचालय
आँगन भी था अच्छा-खासा
इस मकान में तुम्हारा भी था अपना एक कमरा
और उस कमरे में एक पलंग
पलंग के नीचे रखी रहती थी एक बक्सा
मझोले कद-काठी का
बक्से की कुण्डी थी एकदम दुरुस्त
उसमें ताला लगाना तुम कभी नहीं भूलती
तीरथ-धाम या किसी गंगा-स्नान या मेला-बाजार कर
जब भी तुम लौटती
हाथ-मुँह धोने से पहले अपना वो बक्सा खोलती
और उसमें कुछ रखती-सहेजती
हम तब छोटे थे और हमसबों के सिवा
और किसी को उस बक्से में नहीं थी कोई दिलचस्पी
घर की औरतों के लिए तो वह मजाक का विषय था
पर, हम सबों के लिए वह
बतासा, मोतीचूर, बेलग्रामी, लकठो आदि का भंडार था
जिसकी बाक्साइन गंध
हम नहीं भूल पाए हैं आजतक
ओ बड़की माई !
लोग तुम्हें कहते थे मुसमात
ईया तुमको कहती थी जीवन बो
हम तब नहीं जानते थे
कि मुसमात दरअसल है किस बला का नाम
हम तो यही जानते थे
कि मुसमात तीरथ-धाम, गंगा-स्नान, मेला-बाजार करती है
गाँव में बारात जब आती है और उसमें नाच-काच होता है
तो बच-छिपकर रात-रातभर नाच-काच देखती है
हमसबों के लिए अपने बक्से में
बतासा, मोतीचूर, बेलग्रामी, लकठो रखती है
सबकी नजरों से बच-बचाकर देती है
बिना किसी से पूछे-आछे वह
चुपके से कहीं का कहीं निकल जाती है
नहा-धोकर धूप-बाती करती है कुछ गाती-गुनगुनाती है
जिसका पूरापूरी मरम खुला बहुत बाद में
और खुला तो मन आँसुओं से हुआ तर
अपने बक्से में तुम ताला लगाना कभी नहीं भूलती
पर कमरे की महज जंजीर चढ़ा तुम निकल पड़ती
अचानक किसी सुबह
और किसी को कुछ पता नहीं होता
कभी सुबह निकलती तो शाम को ही आ धमकती
कभी गायब रहती हफ्ता-दस दिन
तुम्हारा गायब रहना किसी को भी नहीं अखरता
घर-आँगन के क्रिया-कलाप सब यथावत
अचानक जब आ धमकती किसी सुबह या सांझ
घर की कोई औरत लोटा में पानी ले तुम्हारे धो देती पॉंव
और तीरथ-धाम के अर्जित सारे पुण्य
उसको असीसने में तुम खर्च कर देती
और हम सब तुम्हारे आस-पास मंडराते
कि बक्से से अबकी देखते हैं निकलता है क्या!
तुम रोज नहाती
सूरज महाराज को जल चढाती
अपने कमरे की दीवार पर खूंटियों के सहारे टिके तखते पर
देवी-देवताओं की मूरतों पर जल छिड़कती
धूप-बाती दिखाती
कुछ बुदबुदाती कुछ गाती-
'सूतल रहलीं पलंग पर हो गुरूजी दिहलें जगाय'
तुम्हारे कमरे की पलंग और मूरतों से जोड़कर
मोटा एक अरथ उचरता तब जेहन में
कि इन्हीं मूरतों के जगाने से तुम निकल पड़ती हो तीरथ-धाम
हम सांझ को कभी तुमसे कथा कहने को कहते
तुम सुनाती कोई न कोई कथा
और इसके बाद हम चले जाते अपनी अपनी माँ के पास
और खा-पीकर तुम्हारे कथा-पात्रों के साथ
हम चले जाते नींद के सपनों की दुनिया में
और तुम अपने उस कमरे में अपनी अंतर्ध्वनियों के साथ
धूप -बाती दिखाते तुम गाती गुनगुनाती अक्सर जो एक गीत
उसकी एक पंक्ति कौंधती है बारम्बार
'सामी के सुरतिया मनवा में रखतीं '
जब भी तुम गुनगुनाती यह गीत
स्वर तुम्हारा भींगा भींगा सा लगता
शीघ्र स्नान का प्रभाव तो यह बिलकुल नहीं था
जिस सामी की स्मृतियों में
तुम भिंगोये रखना चाहती थी अपने को
उसकी सूरत को चित् से उतरने नहीं देना चाहती थी
सब कठिन हो चला था तुम्हारे लिए
ओह री माई !
अपनी इस पंक्ति के साथ
ताजिंदगी तुम बनी रही जीवन बो
जीवन सिंह के नहीं होने के बावजूद
धूप-बाती जस जलती हुई,
पास के कुण्डेश्वर शिव का मेला देखा मैंने तुम्हारे संग
तुमने खिलाई थी जिलेबियाँ
तुम हम सबको नहीं ले जा सकती थी अपने साथ कहीं
कहकर तो नहीं मना किया था किसी ने, पर मना था
गाँव की नदी में नहाने तुम जाती थी अक्सर
नदी के पानी को सराहती कहते हुए कि धारा है एकदम निर्मल
स्वच्छ फिटकिरी की तरह
नदी नहाने का लुत्फ़ हम भी तब उठा लेते थे तुम्हारे संग
ब्रह्मपुर, बक्सर, कशी, प्रयाग, हरिद्वार, मथुरा, वृन्दावन, जगन्नाथ धाम, गंगासागर
कहाँ-कहाँ नहीं गई तुम
पर कोई सुननेवाला नहीं था तुम्हारा यात्रा-संस्मरण
अपने सारे संस्मरणों के साथ अब नहीं हो तुम
राजनीति तुम्हारा विषय नहीं रहा कभी
पर इंदिरा गांधी से तुम्हारा न जाने कैसा अपनापा था
आरा, बक्सर, शाहपुर जहाँ कहीं भी आनेवाली होती
इंदिरा गाँधी
तुम वहां पहुंचे बिना नहीं रही
घर की राजनीतिक धारा के विपरीत
तुमने हमेशा अपना वोट इंदिरा गाँधी को ही दिया
पर सतहत्तर में तुम्हारे भी बोल गए थे बदल
इंदिरा की सपने में भी शिकायत नहीं करनेवाली तुम
कहने लगी थी हत्यारिन
तुम कहा करती थी 'जार केहू के ढेर दिन ना चलल बा ना चली'
वोट देते समय मतदानकर्मी तुम्हारे नाम की परची
तुम्हारे हाथ से ले गुहराते
फूला देवी, पति-जीवन सिंह
शायद यही एक अवसर होता तुम्हारे लिए
किसी कागज़ पर अपने नाम के साथ अपने सामी का नाम अंकित देखने का
तुम थी झक्क गोरी, सुन्दर-सुभेख
बड़े-से मकान के भीतर
एक कमरे में रखे बक्से की ताला-कुण्डी में
अँटका तुम्हारा मन
जब आखिरी धाम को किया पयान
जहाँ केवल जाना होता है
तब भी घर की सेहत पर नहीं पड़ा खास फरक
जिनको रोना था, दो धार रो लिया
तुम्हारे बक्से का वह कुण्डी-ताला एक ही झटके में टूट गया
उस बक्से में पड़ी थी मूरतें देवी-देवताओं की
कुछ बतासे, कुछ बिस्कुट
खुली एक दियासलाई, अगरबत्ती का खुला एक पॉकेट
लाइफ़बॉय, सनलाइट साबुन
कुछ पुराने धुराने कपडे
एक तड़प
गीत की वह पंक्ति-'सामी के सुरतिया मनवा में रखतीं '
जिसको उस वक़्त शायद ही किसी ने सुना हो.
..............
और रिश्ते की प्रगाढ़ता को पेश करती नेम-प्लेट भी गौरेतलब है-

नेम-प्लेट
(छोटे भई विमल के लिए)..
आख़िरकार तुमने लगा ही दिया
मेरा नेम-प्लेट,
जो पड़ा हुआ था बनारस मे यूँ ही
लाकर वहाँ से
गाँव के दुआर के बरामदे में लगा ही दिया तुमने
मैंने तो नहीं बनवाया था इसे
बनवाने को कभी सोचा भी नहीं था
यह तो वर्माजी के उत्साही पुत्रों ने
मुझसे बिना कुछ बताए,
दिया था मेरे जन्म-दिन के उपहार के तौर पर
और यह अबतक का प्रथम उपहार था मेरे जन्म-दिन का.
इसे बनारस में बच्चों ने ज़रूर लगाया दीवार पर
पर, मैने ही उतार दिया एक-दो दिन बाद
जब भी मेरी पड़ती इसपर नज़र
मन ही मन शर्मा जाता रहा
कि इतना तो नहीं हो गया बड़ा
और यह आत्म-प्रदर्शन!
और उसी को तुमने लाकर बनारस से
लगा दिया गाँव पर-
'डॉ बलभद्र सिंह
हिन्दी विभाग,
गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह'.
गाँव पर इसे जब देखा पहली बार,
तो पड़ गया आश्चर्य में
अरे, यह यहाँ कैसे!
फिर फोन किया बनारस
तो मालूम हुआ कि उठा लाए तुम वहाँ से
पोंछ-पांछ कर
और दीवाल मे यहाँ ठोककर कीलें
लगा दिया तुमने
चलो ठीक ही किया
पड़ा हुआ था वहाँ बेमतलब
ठीक ही किया तुमने
और जो किया सो आजकल करता ही कौन है?
भाई का नेम-प्लेट शान से लगाते ही कितने हैं?
तुम्हें मालूम होना चाहिए
कि मेरा यह नाम
पिता के चाचा का है दिया हुआ
उनको मिला था यह नाम जगन्नाथ धाम की यात्रा में
और यह भी मालूम होना चाहिए
कि तुम्हारा नाम पिता के छोटका बाबूजी का है दिया हुआ-
जिनको हमसब कहते थे कलकतवा बाबा
कलकत्ता से पोस्ट-कार्ड पर पर लिखकर भेजा था उन्होंने।
बिमल अर्थ सहित......
..........
'समय की ठनक' की कविताओं में ऐसी कई पठनीय कविताएं है, जिससे गुजरना संवेदना के सागर में डुबकी लगाने जैसा है। इसमें दर्ज 'कविता मेरी' बताती है कि कवि ने ये कविताएँ क्यों लिखी हैं। कवि को अपने समय की विद्रूपताएं बाध्य करती हैं कुछ सोचने-विचारने और उन पर कुछ कहने के लिए। संग्रह की पहली कविता अन्न हैं, कलपेंगे से अन्न की महत्ता को रेखांकित करता है कवि।
आया कि
अन्न हैं, कलपेंगे पड़े-पड़े
धंगाते रहेंगे पैरों तले
ठीक नहीं इनका अपमान
वह तो चिरई है बाबा की कविता की यह पंक्तियां कितनी मार्मिक हैं, इसे देखें-
मैं बड़ा हुआ और होता ही गया
फिर हुआ एक दिन ऐसा
कि चिरई की तरह
बाबा ही उड़ गए फुर्र...
पर, उनकी वह चिरई
मैं जहां-जहां जाता हूं
वहां-वहां जाती है
शिव-शिव गुहराती है
जगाती है रोज
मैं देखता चाहता हूं उसे
इसी तरह की कई कविताएं हैं इसमें। जैसे कि बात ठन गई। छोटी मगर, मजबूती से खड़ी रिक्शेवाले के पक्ष में-
धक्का खाया
भरी सड़क पर रिक्शा छितराया
रह गए हम सब हक्के-बक्के
कहीं से कोई बोल न पाया
खड़ा हो गया रिक्शावाला
देह झाड़ कर
गोल बने दो
बात ठन गई।
........
पुलिस फायरिंग, जातीय संघर्ष, जनसंहार जैसी दुखद वारदातों पर भी साहस के साथ दर्ज हुईं हैं कविताएं।
कोई सुने तो एक छोटी कविता है।
चल रही है गेहूं की कटाई
ताबड़तोड़ चल रहे हैं हंसिये
खेतों से उठ रहा है एक संगीत चतुर्दिक
कोई सुने तो समझे
झींगुरों ने भी इसमें डाली है जान।
कवि ने अपनी इस किताब को समर्पित किया है कथाकार मार्कण्डेय की स्मृति को।
इस किताब की कविताएं पढ़ी जानी चाहिए।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

पाठकीय!

 1.

शिव कुमार यादव
पाठकीय! 
अरसा बाद एक साथ कई कहानियों पढ़ने का मौका हाथ लगा। इन कहानियों को पढ़ते हुए मन खराब हो गया। गाँवों में आधुनिकता के असबाब तो पहुंच गए, आधुनिक विचारों की आमद मगर अत्यंत कम। बदले तो बदले कैसे मंजर / पोशाकें बदलीं,रहे ख्यालात वहीं। जातिवाद का नाग अब भी फन काढ़े हुए। राजनीति की तिकड़में, जातीय तनाव की मार भरपूर। लड़ाने-भिड़ाने में मजा लेने वाले कम नहीं, संबंधों में नई-नई पेंच। मुकदमें में मिट जाएंगे गम नहीं। कथित नाक की लड़ाई से बाज नहीं आएंगे। आँगन बंटने की, खेत बंटने की पीड़ा से छुटकारा नहीं। गाँव से शहर जाकर हालात सुधारने की कोशिशों पर भी अब आफत बन आई है। दंगे-फसाद, क्षेत्रीयता की भावनाओं में उछाल आदि घर वापसी की सौगात पेश करने लगी है। इधर खेती में अनिश्चितता है तो उधर रोजगार पर मार। कहो कहाँ जाओगे, मनचाही दुनिया कहाँ बसाओगे! 
औरतें अब भी दोहरी मार को झेलती हुईं। देह बेचने की मजबूरी बरकरार है, जला दी गई औरत सती माई के रूप में पूजी जा रही है। घर-गाँव से खदेड़ दी गई गरीब की बेटी, जो प्रसव पीड़ा की भेंट चढ़ जाती है, उसे संतान की मन्नत पूरी करने वाली माई के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। 'हंसली माई की जै' कहानी में इसी विडंबना को रेखांकित किया गया है। ऐसी ही विडंबनाओं, विसंगतियों के तमाम ब्यौरे हैं इस किताब की सोलह कहानियों में। किताब का नाम है  'भूर...भू..स्वाहा'। नेकी का, आदमीयत का स्वाहा होने का जैसे यह समय। 'मरकहा' कहानी में एक झटके से जैसे बिगडैल बैलों से पिण्ड छुड़ाने की असंवेदनशीलता ठीक वैसे ही हाड़-मांस के भदई से भी, जो बाबूसाहब की खेती-मवेशी को संभालने में उम्र खपा रहा होता है। 
इस किताब के कहानीकार हैं शिव कुमार यादव। वे प. बंगाल के शिल्पांचल के बर्नपुर में रहकर लेखन में रमे हुए हैं। उनकी यह किताब समर्पित है देश के उन किसानों के लिए, जो अपने हक के लिए लड़ाई लड़ते हुए शहीद हो गए। इन कहानियों को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है की हमारे बीच हवा- हवाई ही नहीं, जमीनी यथार्थ पर नजर रखने वाले कथाकार भी हमारे बीच हैं। शिव कुमार एक ऐसे ही कलमकार हैं। भोजपुरी अंचल से आने वाले कथाकार अपने उस अंचल के अर्द्ध-सामंती समाज के पर्वेक्षण- निरीक्षण में सफल लगते हैं। 
किताब को दिल्ली के 'अनिरुद्ध बुक्स' ने छापा है। मूल्य 400 रु. है। 

2.
बलभद्र
श्रम और संबंधों को तरजीह देती कविताएं

इस कवि की कविताओं से छिट-पुट मुलाकात होती रही है। हिन्दी के अलावा भोजपुरी में भी लिखते हैंं। इनकी कविताओं में श्रम को मान देने की झलक मिलती रही है। पहली बार उनके  संग्रह की कविताओं से गुजर कर पता चला कि रिश्तों को तरजीह देने की कई कविताएं भी हैं कवि के पास। दादा,पिता,मां आदि को बहुत आत्मीय ढंग से याद किया गया है। बाबा की चिरई, माई की घर-गृहथ्ती, स्नेह ममत्व, पिता की जीवटता-समर्पण मन को मोहने, द्रवित करने का काम करती जाती हैं। इसी तरह फसल काटती मजूरन, साइकिल से कोयला ले जाते लोग,ईंट पाथने वाले, आदीवासी औरत आदि पर कविताएं भी। कविता संग्रह का नाम है-' समय की ठनक' । इसे लोकायत प्रकाशन ,वाराणसी ने छापा है। आलोचक गोपाल प्रधान ने इस पर लंबी भूमिका लिखी है।कवि का नाम है बलभद्र। पेशे से आचार्य हैं। जसम जैसे संगठन से जुड़े हुए। जाहिर है, प्रतिरोध का स्वर को भी जगह है इसमें। गोपाल प्रधान सही कहते हैं कि बिहार के भोजपुर का संघर्षशील इलाका कवि का अपना इलाका है, लेकिन उनकी संवेदना उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। वे अपने इस सुपरिचित संसार को लांघकर भूगोल के मामले में नए इलाकों की यात्रा करते हैं....किसी कुशल छायाकार की तरह उन्होंने मेहनत से जुड़े ढेरों बिंब साधे हैं। उनके बिंबों में गति है।
यह सच है। उनकी कई कविताएं इसकी गवाही देतीं हैं। जैसे कि रोपनहारिनें को ही देखें-

रोपनहारिनें
बड़े ही विश्वास के साथ
दूधमुँह थाती को सौंप थकी उम्र को
आँगन से दिनभर की मुहलत माँग
छतनार आकाश की छाँव तले
अपने अथक श्रम सीकरों से
हरियाली रचने के व्रत के साथ निकलती हैं रोपनिहारिनें
चेहरे पर मेहनत की मटमैली चमक
बोली में रहर की ढेंढियों-सी खनक
मेड़ों पर पछुआ की ठसक ठिठोली
गीले अहसासों से गदरायी धरती
लचक गये पाँव
धसक गयी मेंड़, थोड़ी
सुगबुगाये घास-फूस
पास के महुवे से फड़क उठीं चिड़ियाँ
झेंप गईं हँसकर अल्हड़ रोपनिहारिनें
उमड़-घुमड़ घटाएं
बरसा गईं रिमझिम
जुड़ा गया तन-मन
हवा की थापों पर थिरकी दिशाएं
निहाल हुए हल के हत्थे पर पलभर सुस्ताते हलवाहे
मन ही मन कुपित सूरज
उगलने लगा आग देखजर्रू-सा
अदहन हुआ पानी
युद्धक्षेत्र-सा तनी रही खेतों में जिद्दी रोपनिहारिनें
कभी धूप कभी छाँव के साथ
सीमित में सिमटे बीचड़ों को
देती हैं संभावना और विस्तार
हवा के झोकों से झालर मारते नन्हे नन्हे पौधे
मुँह और पीठ किस दिशा में हों
मुड़ेंगी कलाइयाँ किस कोण से
कब गाएं, सुस्ताएं कब, कैसे--
हवा के रुख को खूब पहचानती हैं रोपनिहारिनें
धरती के पिछड़े हिस्से पर ही सही
जहाँ जमीन और मर्यादा एक मकसद है
जहाँ आकार ले रहा है बदलाव
अपने गीतों से धरती को जगाती
फुफकारते विषधरों के
हर फन का माकूल प्रतिरोध करती हैं रोपनिहारिनें
धरती की धूसर चूनर पर अंकित
अथक शब्दों में
श्रम की अंतहीन गाथा, जिसे
बांचती हुई पुरखों की जन्मपत्री
उसके अंजाम तक पहुंचाएंगी रोपनिहारिनें
......
बड़की माई (बड़ी मां)कविता ग्राम्य समाज की पूरी तस्वीर को ही पेश कर देती है- पढ़ी जाए यह-

बड़की माई
तब यह मकान बड़ा था
इसमें दस कमरें और दो निकास थे
एक सीढ़ी घर और एक शौचालय
आँगन भी था अच्छा-खासा
इस मकान में तुम्हारा भी था अपना एक कमरा
और उस कमरे में एक पलंग
पलंग के नीचे रखी रहती थी एक बक्सा
मझोले कद-काठी का
बक्से की कुण्डी थी एकदम दुरुस्त
उसमें ताला लगाना तुम कभी नहीं भूलती
तीरथ-धाम या किसी गंगा-स्नान या मेला-बाजार कर
जब भी तुम लौटती
हाथ-मुँह धोने से पहले अपना वो बक्सा खोलती
और उसमें कुछ रखती-सहेजती
हम तब छोटे थे और हमसबों के सिवा
और किसी को उस बक्से में नहीं थी कोई दिलचस्पी
घर की औरतों के लिए तो वह मजाक का विषय था
पर, हम सबों के लिए वह
बतासा, मोतीचूर, बेलग्रामी, लकठो आदि का भंडार था
जिसकी बाक्साइन गंध
हम नहीं भूल पाए हैं आजतक
ओ बड़की माई !
लोग तुम्हें कहते थे मुसमात
ईया तुमको कहती थी जीवन बो
हम तब नहीं जानते थे
कि मुसमात दरअसल है किस बला का नाम
हम तो यही जानते थे
कि मुसमात तीरथ-धाम, गंगा-स्नान, मेला-बाजार करती है
गाँव में बारात जब आती है और उसमें नाच-काच होता है
तो बच-छिपकर रात-रातभर नाच-काच देखती है
हमसबों के लिए अपने बक्से में
बतासा, मोतीचूर, बेलग्रामी, लकठो रखती है
सबकी नजरों से बच-बचाकर देती है
बिना किसी से पूछे-आछे वह
चुपके से कहीं का कहीं निकल जाती है
नहा-धोकर धूप-बाती करती है कुछ गाती-गुनगुनाती है
जिसका पूरापूरी मरम खुला बहुत बाद में
और खुला तो मन आँसुओं से हुआ तर
अपने बक्से में तुम ताला लगाना कभी नहीं भूलती
पर कमरे की महज जंजीर चढ़ा तुम निकल पड़ती
अचानक किसी सुबह
और किसी को कुछ पता नहीं होता
कभी सुबह निकलती तो शाम को ही आ धमकती
कभी गायब रहती हफ्ता-दस दिन
तुम्हारा गायब रहना किसी को भी नहीं अखरता
घर-आँगन के क्रिया-कलाप सब यथावत
अचानक जब आ धमकती किसी सुबह या सांझ
घर की कोई औरत लोटा में पानी ले तुम्हारे धो देती पॉंव
और तीरथ-धाम के अर्जित सारे पुण्य
उसको असीसने में तुम खर्च कर देती
और हम सब तुम्हारे आस-पास मंडराते
कि बक्से से अबकी देखते हैं निकलता है क्या!
तुम रोज नहाती
सूरज महाराज को जल चढाती
अपने कमरे की दीवार पर खूंटियों के सहारे टिके तखते पर
देवी-देवताओं की मूरतों पर जल छिड़कती
धूप-बाती दिखाती
कुछ बुदबुदाती कुछ गाती-
'सूतल रहलीं पलंग पर हो गुरूजी दिहलें जगाय'
तुम्हारे कमरे की पलंग और मूरतों से जोड़कर
मोटा एक अरथ उचरता तब जेहन में
कि इन्हीं मूरतों के जगाने से तुम निकल पड़ती हो तीरथ-धाम
हम सांझ को कभी तुमसे कथा कहने को कहते
तुम सुनाती कोई न कोई कथा
और इसके बाद हम चले जाते अपनी अपनी माँ के पास
और खा-पीकर तुम्हारे कथा-पात्रों के साथ
हम चले जाते नींद के सपनों की दुनिया में
और तुम अपने उस कमरे में अपनी अंतर्ध्वनियों के साथ
धूप -बाती दिखाते तुम गाती गुनगुनाती अक्सर जो एक गीत
उसकी एक पंक्ति कौंधती है बारम्बार
'सामी के सुरतिया मनवा में रखतीं '
जब भी तुम गुनगुनाती यह गीत
स्वर तुम्हारा भींगा भींगा सा लगता
शीघ्र स्नान का प्रभाव तो यह बिलकुल नहीं था
जिस सामी की स्मृतियों में
तुम भिंगोये रखना चाहती थी अपने को
उसकी सूरत को चित् से उतरने नहीं देना चाहती थी
सब कठिन हो चला था तुम्हारे लिए
ओह री माई !
अपनी इस पंक्ति के साथ
ताजिंदगी तुम बनी रही जीवन बो
जीवन सिंह के नहीं होने के बावजूद
धूप-बाती जस जलती हुई,
पास के कुण्डेश्वर शिव का मेला देखा मैंने तुम्हारे संग
तुमने खिलाई थी जिलेबियाँ
तुम हम सबको नहीं ले जा सकती थी अपने साथ कहीं
कहकर तो नहीं मना किया था किसी ने, पर मना था
गाँव की नदी में नहाने तुम जाती थी अक्सर
नदी के पानी को सराहती कहते हुए कि धारा है एकदम निर्मल
स्वच्छ फिटकिरी की तरह
नदी नहाने का लुत्फ़ हम भी तब उठा लेते थे तुम्हारे संग
ब्रह्मपुर, बक्सर, कशी, प्रयाग, हरिद्वार, मथुरा, वृन्दावन, जगन्नाथ धाम, गंगासागर
कहाँ-कहाँ नहीं गई तुम
पर कोई सुननेवाला नहीं था तुम्हारा यात्रा-संस्मरण
अपने सारे संस्मरणों के साथ अब नहीं हो तुम
राजनीति तुम्हारा विषय नहीं रहा कभी
पर इंदिरा गांधी से तुम्हारा न जाने कैसा अपनापा था
आरा, बक्सर, शाहपुर जहाँ कहीं भी आनेवाली होती
इंदिरा गाँधी
तुम वहां पहुंचे बिना नहीं रही
घर की राजनीतिक धारा के विपरीत
तुमने हमेशा अपना वोट इंदिरा गाँधी को ही दिया
पर सतहत्तर में तुम्हारे भी बोल गए थे बदल
इंदिरा की सपने में भी शिकायत नहीं करनेवाली तुम
कहने लगी थी हत्यारिन
तुम कहा करती थी 'जार केहू के ढेर दिन ना चलल बा ना चली'
वोट देते समय मतदानकर्मी तुम्हारे नाम की परची
तुम्हारे हाथ से ले गुहराते
फूला देवी, पति-जीवन सिंह
शायद यही एक अवसर होता तुम्हारे लिए
किसी कागज़ पर अपने नाम के साथ अपने सामी का नाम अंकित देखने का
तुम थी झक्क गोरी, सुन्दर-सुभेख
बड़े-से मकान के भीतर
एक कमरे में रखे बक्से की ताला-कुण्डी में
अँटका तुम्हारा मन
जब आखिरी धाम को किया पयान
जहाँ केवल जाना होता है
तब भी घर की सेहत पर नहीं पड़ा खास फरक
जिनको रोना था, दो धार रो लिया
तुम्हारे बक्से का वह कुण्डी-ताला एक ही झटके में टूट गया
उस बक्से में पड़ी थी मूरतें देवी-देवताओं की
कुछ बतासे, कुछ बिस्कुट
खुली एक दियासलाई, अगरबत्ती का खुला एक पॉकेट
लाइफ़बॉय, सनलाइट साबुन
कुछ पुराने धुराने कपडे
एक तड़प
गीत की वह पंक्ति-'सामी के सुरतिया मनवा में रखतीं '
जिसको उस वक़्त शायद ही किसी ने सुना हो.
..............
और रिश्ते की प्रगाढ़ता को पेश करती नेम-प्लेट भी गौरेतलब है-

नेम-प्लेट
(छोटे भई विमल के लिए)..
आख़िरकार तुमने लगा ही दिया
मेरा नेम-प्लेट,
जो पड़ा हुआ था बनारस मे यूँ ही
लाकर वहाँ से
गाँव के दुआर के बरामदे में लगा ही दिया तुमने
मैंने तो नहीं बनवाया था इसे
बनवाने को कभी सोचा भी नहीं था
यह तो वर्माजी के उत्साही पुत्रों ने
मुझसे बिना कुछ बताए,
दिया था मेरे जन्म-दिन के उपहार के तौर पर
और यह अबतक का प्रथम उपहार था मेरे जन्म-दिन का.
इसे बनारस में बच्चों ने ज़रूर लगाया दीवार पर
पर, मैने ही उतार दिया एक-दो दिन बाद
जब भी मेरी पड़ती इसपर नज़र
मन ही मन शर्मा जाता रहा
कि इतना तो नहीं हो गया बड़ा
और यह आत्म-प्रदर्शन!
और उसी को तुमने लाकर बनारस से
लगा दिया गाँव पर-
'डॉ बलभद्र सिंह
हिन्दी विभाग,
गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह'.
गाँव पर इसे जब देखा पहली बार,
तो पड़ गया आश्चर्य में
अरे, यह यहाँ कैसे!
फिर फोन किया बनारस
तो मालूम हुआ कि उठा लाए तुम वहाँ से
पोंछ-पांछ कर
और दीवाल मे यहाँ ठोककर कीलें
लगा दिया तुमने
चलो ठीक ही किया
पड़ा हुआ था वहाँ बेमतलब
ठीक ही किया तुमने
और जो किया सो आजकल करता ही कौन है?
भाई का नेम-प्लेट शान से लगाते ही कितने हैं?
तुम्हें मालूम होना चाहिए
कि मेरा यह नाम
पिता के चाचा का है दिया हुआ
उनको मिला था यह नाम जगन्नाथ धाम की यात्रा में
और यह भी मालूम होना चाहिए
कि तुम्हारा नाम पिता के छोटका बाबूजी का है दिया हुआ-
जिनको हमसब कहते थे कलकतवा बाबा
कलकत्ता से पोस्ट-कार्ड पर पर लिखकर भेजा था उन्होंने।
बिमल अर्थ सहित......
..........
'समय की ठनक' की कविताओं में ऐसी कई पठनीय कविताएं है, जिससे गुजरना संवेदना के सागर में डुबकी लगाने जैसा है। इसमें दर्ज 'कविता मेरी' बताती है कि कवि ने ये कविताएँ क्यों लिखी हैं। कवि को अपने समय की विद्रूपताएं बाध्य करती हैं कुछ सोचने-विचारने और उन पर कुछ कहने के लिए। संग्रह की पहली कविता अन्न हैं, कलपेंगे से अन्न की महत्ता को रेखांकित करता है कवि।
आया कि
अन्न हैं, कलपेंगे पड़े-पड़े
धंगाते रहेंगे पैरों तले
ठीक नहीं इनका अपमान
वह तो चिरई है बाबा की कविता की यह पंक्तियां कितनी मार्मिक हैं, इसे देखें-
मैं बड़ा हुआ और होता ही गया
फिर हुआ एक दिन ऐसा
कि चिरई की तरह
बाबा ही उड़ गए फुर्र...
पर, उनकी वह चिरई
मैं जहां-जहां जाता हूं
वहां-वहां जाती है
शिव-शिव गुहराती है
जगाती है रोज
मैं देखता चाहता हूं उसे
इसी तरह की कई कविताएं हैं इसमें। जैसे कि बात ठन गई। छोटी मगर, मजबूती से खड़ी रिक्शेवाले के पक्ष में-
धक्का खाया
भरी सड़क पर रिक्शा छितराया
रह गए हम सब हक्के-बक्के
कहीं से कोई बोल न पाया
खड़ा हो गया रिक्शावाला
देह झाड़ कर
गोल बने दो
बात ठन गई।
........
पुलिस फायरिंग, जातीय संघर्ष, जनसंहार जैसी दुखद वारदातों पर भी साहस के साथ दर्ज हुईं हैं कविताएं।
कोई सुने तो एक छोटी कविता है।
चल रही है गेहूं की कटाई
ताबड़तोड़ चल रहे हैं हंसिये
खेतों से उठ रहा है एक संगीत चतुर्दिक
कोई सुने तो समझे
झींगुरों ने भी इसमें डाली है जान।
कवि ने अपनी इस किताब को समर्पित किया है कथाकार मार्कण्डेय की स्मृति को।
इस किताब की कविताएं पढ़ी जानी चाहिए।
3.
रोमेंद्र कुशवाहा
कहानी संग्रह का नाम है - 'आसमां से आगे'। इसे पढ़ते ही इस गाने का मुखड़ा याद आ गया जाने क्यों-

'आसमां के नीचे, हम आज अपने पीछे
प्यार का जहाँ बसा के चले
कदम के निशाँ, बना के चले... '

लेकिन प्यार का जहाँ बनाना इतना आसान भी नहीं। 
संग्रह की कहानियों को पढ़ते हुए भी ऐसा लगता है। बहरहाल, इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं,जो शहरी निम्न-मध्य वर्ग से ताल्लुक रखती हैं। इनमें समाज के छद्म हैं, संघर्ष हैं और हैं मामूली सपने। स्त्री और पारिवारिक विडंबनाएँ भी। पहली कहानी बदलते समाज  बदलती मानसिकता का परिचय देती है- कुछ अचंभित करती। निष्ठा उसके घर में किरायेदार के रूप में आती है, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी। वह बीटेक है, किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम कर रहा है। निष्ठा के पिता की सलाह पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए तैयारी करता है। अपने घर के पास ही निष्ठा के पिता के प्लाट पर घर बनाने में मदद करता है। और आईएएस की परीक्षा भी पास कर लेता है। उसकी माँ निष्ठा को बहू के रूप में देखने लगती है, पर पढ़ी-लिखी सुंदर लड़की काले कुरूप विधायक से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है और 'अच्छा पड़ोसी' ठगा-सा। आईएएस पर एमएलए भारी पड़ जाता है। उपभोक्तावाद ने संबंधों, भावनाओं की क्या गति कर दी है, यह कहानी यही बताती है। संग्रह की आमुख कथा 'आसमां से आगे' पुरुषवादी सोच पर प्रहार करती स्त्री विमर्श की कहानी है। कामकाजी स्त्री की तकलीफों को बयां करती। स्कूल शिक्षिका बबिता, सास, पति की असंवेदनशीलता की चक्की में पीसते हुए अंततः दुश्वारियों पर जीत दर्ज करती है। इसी तरह एक कहानी 'परिवर्तन' पुरुष अहं और दांव पेंच को उजागर करती है। 'घूटन' कहानी में नौकरी छूट जाने से बेरोजगार हो गए व्यक्ति की व्यथा- कथा पेश करती है। 'दंश' कहानी में स्वाभाविक मृत्यु को हत्या, आत्महत्या में दिखाने की विडंबना- झूठ का पर्दाफाश करती है। भू-माफियाओं के करतब से परेशान लोगों की कहानी कहती है 'भूभक्षी'! 'लुटेरे' में मजदूर वर्ग की लाचारी और उसके प्रति उदासीनता का चित्रण है। 'मुक्ति', 'ईमान का मसीहा' भी समाज में पैठ बना चुकी विद्रूपता को सामने लाती है। 'न्यायी का न्याय' न्याय पर भरोसा पैदा करने वाली कहानी है। इसमें एक पुत्र द्वारा अपने पिता को घर से निकाल देने की मार्मिक कथा है। 'उसकी ताकत' यौन शोषण की कहानी है, जिसमें रिश्ते के लोग भी शामिल हैं। 
कुल मिलाकर बदलते समाज की नई विकृतियों पर पैनी नजर है कहानीकार रोमेंद्र कुशवाहा की। इसे देहरादून के 'समय साक्ष्य' ने छापा है। 

4.


शनिवार, 2 जनवरी 2021

उड़ान को पंख देती कविताएं !

 

उड़ान को पंख देती कविताएं !
लखनऊ की सांस्कृतिक कार्यकर्ता व कवयित्री विमल किशोर के कविता संग्रह " पंख खोलूं उड़ चलूं "से गुजरना सुखकर है । विमल जी का यह पहला संग्रह है। कुल 43 कविताएं दर्ज है इसमें । स्त्री विमर्श का स्वर मुखर है ,आक्रोश भी लाजमी है । लेकिन साथ-साथ प्रेम, प्रकृति, रिश्तों के सहज निर्वाह की कविताएं भी है।
आगे कुछ कहने से पहले विमल जी की कुछ छोटे आकार और गहरे भाव बोध की कुछ कविताओं से गुजर लिया जाए-
1.
चांद से दोस्ती

बिस्तर पर लेटी
नींद आने के झूठे प्रयास में
करवटें बदलती
अचानक तेज शीतल रोशनी से
खुल गईं आंखें
खिड़की के रास्ते चांद झांक रहा था
मुझसे हाथ फैला दोस्ती का
मांग रहा था हाथ
फिर क्या था
फटाफट ले लिए थे मैंने
चांद को तस्वीरों में
और हो गई दोस्ती लो
पूरी प्रगाढ़ता के साथ।
2.
किताब

किताब में लिखी बातें
सब झूठी हो जाएंगी
किसी को जानने के लिए
नहीं पलटे जाएंगे पन्ने
आदमी मिलेगा किताबों में नहीं
मूर्तियों में
उसका कद
उसकी महानता नापी जाएगी
मूर्तियों की ऊंचाई से।
3.
तुम कहां हो

खोजती हूं तुम्हें
मैं तारों के आसपास
क्योंकि तुम दूर हो
बहुत दूर
बिजली कौंध उठती है
पर बादलों के उस पार नहीं
आंखों के अंबर में
घटाएं आतीं
चली जाती हैं
मौसम भी बदलता है
शीत की बूंदें फिसलन बन जाती हैं
और इसलिए
मन पुकार उठता है
तुम कहां हो
कहां हो...?
4.
तुम्हारा न होना

जीवन की डगर पर
मुझे अकेला जान
यादों के ये तस्कर
मेरा पीछा कर रहे हैं
निरंतर
मेरी अपनी परछाई की तरह
बांध न पाया तुम्हें
मेरा प्यार
अब इस भीड़ भरे
एकाकीपन में
गहराते अंधेरे
कहां तक संभालूं
अपने को
कितना अखरता है
तुम्हारा
न होना।
5.
नया सूरज

धरती का कलेजा लाल है
और आंचल भी
लाल है माथे का सिंदूर
टिकली और बिंदिया का रंग भी
हृदय से फूटती चिंगारी का रंग लाल है
और लाल है सख्त चेहरे का रंग भी
लाल है दिये की लौ
और हमारा परचम भी
लाल है जलती हुई मशालों का रंग
हमें साफ-साफ दिखता है इसमें
गोलबंद होते हुए लोग
बढ़ते हुए कदम
ढलती हुई रातें
क्षितिज पर फैलती भोर की लाली
चिड़ियों का चहचहाना
और अपनी सम्पूर्ण लालिमा के साथ
उदित होता हुआ
एक नया सूरज।

इस पाठक की पसंद की,विविध भाव-बोध की इन कविताओं की तरह संग्रह की लगभग सभी कविताएं सहज-सरल भाषा में,अभिधा में हैं। भाषाई चमत्कार के कोई लक्षण नहीं हैं। कोशिश नहीं। स्त्री उत्पीड़न,राजनीतिक-प्रशासनिक असंवेदनशीलता, शोषण,जुल्म, सामाजिक विद्रूपताओं को बयां करने की भाषा ऐसी ही हो सकती है।
बहरहाल, `हवाएं गर्म हैं'`,...वाह रे हिंदुत्व', `कोसगंज..'.,`अगस्त में बच्चे मरते ही हैं',`तीन तलाक', `विकास का प्रसाद',`सपने भी डराते हैं',`बलात्कारी सिर्फ...',`गटर में' ,`अनसुनी गांठें' आदि जैसी कविताएं हमारी सरकार और समाज को भी कटघरे में शामिल करने वाली कविताएं हैं। ये कविताएं एक तरफ उदास, हताश करती हैं तो दूसरी तरफ हृदय में गुस्से का संचार। बाजारवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रीयता, लिंगभेद, किसानों, श्रमिकों, बेरोजगारी की बढ़ती समस्याएं और सबसे बढ़कर वोट बंटोरू असंवेदनशील राजनीति पर हर जागरूक,संवेदनशील कलमकार की तरह इस कवयित्री की भी नजर है। यह आश्वस्त करने वाली बात है।आमुख कविता `पंख खोलूं उड़ चलूं' की ये पंक्तियां-मैं अपने सपनों को/पंख देना चाहती हूं/ उड़ना चाहती हूं/उड़-उड़/वहां पहुंचना चाहती हूं/जो मन की चाहत है/.....मैं घर से चारदीवारी से/बाहर निकलना चाहती हूं......

हम जानते हैं कि एक स्त्री की यह चाहत अक्सर घर-परिवार की जिम्मेदारियां और समाज की तरह-तरह की बंदिशें की भेंट चढ़ जाती हैं। पर इस चाहत को बल मिले, यह कामना और कोशिश जरूरी है।

कुलमिलाकर कवयित्री का यह संग्रह पठनीय है, विचारणीय है। स्त्री उड़ान की तलबगार है। इसलिए स्वागत योग्य भी। इसे लखनऊ के लोकोदय प्रकाशन ने छापा है। आवरण आकर्षक है और अंदर के पन्नों की छपाई अच्छी है । 112 पेज के पेपर बैक किताब की कीमत जरूर कुछ ज्यादा है । 210 रुपए ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

आत्माएं

कुछ सोई हुई होती हैं
कुछ बेहोशी में
कुछ पत्थर में तब्दील
कुछ तृप्त
बेचैन आत्माएं भी
कहाँ कम होती हैं
तलाशिये तो आसपास ही मिल जाएंगी तमाम

मगर बच के
निराशा में डुबो देंगी वे आकंठ

24.07.2020

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

लोक के इस तंत्र पर, यह प्रहार तो देखिए

बात-बात पर, बेवजह तकरार तो देखिए
झूठ की जय-जय,सच की हार तो देखिए

नफरत की खेती हैं करते,तोड़ते दिलों को
देशप्रेमियों का यह नया अवतार तो देखिए

यह गर्म हवा आई किधर से इस गुलशन में
हर तरफ खौफ-गुस्सा, मार-मार तो देखिए

दरपेश हैं हमारे सामने कई-कई मुसीबतें
मुंह उनसे चुराने का कारोबार तो देखिए

शपथ ली जिस किताब की,छेड़ने लगे उसे
लोक के इस तंत्र पर, यह प्रहार तो देखिए

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

कविता के बाबत

# कविता के बाबत
एक बार कविता पर विचार करते हुए यह ख्याल मन में आया-सच्ची कविता भेड़चाल का हिस्सा नहीं बनती। वह अपने समय, अपनी परंपरा को पढ़ती, उससे सीखती-समझती रहती है । वह अपने आसपास के सच से आंखें भी नहीं मूंदती। भेड़चाल कभी-कभी विश्वसनीय शक्ल पकड़ने में भी कामयाब होती दिखने लगती है, सो सच्ची कविता उस पर निगाह जरूर रखती है। उसे जांचती-परखती है। भेड़चाल का साम्राज्य रचने वालों की मंशा को समझने की कोशिश करती है। ऐसे में उसे अपनी परंपरा के सार्थक बिंदुओं से दो-चार होना पड़ता है। तब उसकी मदद के लिए कालिदास, रहीम ,कबीर, तुलसी. सूर, निराला, नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन आदि तक पांव बढ़ा देते हैं।
कविता के बाबत हमारे पूर्वजों ने या अग्रज पीढी ने कुछ कम नहीं कहा है। कविता क्या है, उसकी  आवश्यकता क्या है, क्यों हैं, इस पर बहुत कुछ कहा गया है, आगे भी कहा-लिखा जाता रहेगा। बहरहाल,
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है-
मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य असभ्य सभी जातियों में,किसी न किसी रूप में पाई जाती है । चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो,पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा।बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मण्डल बाँधता चला आ रहा है कि जिसके भीतर बँधा बँधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का सम्बन्ध भूला सा रहता है।इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर बराबर रहता है।इसी से अंतःप्रकृति में मनुष्यता को समय समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली आ रही है और चली चलेगी।जानवरों को इसकी ज़रूरत नहीं।
# अभी एक पत्रिका में कवि राणा प्रताप को पढ़ा। वह कहते हैं- कविता के चेहरे की लालिमा उसका जीवन संघर्ष है,उसका संघर्ष--संकुल लोक है और विचार से आकुल-व्याकुल उसका मन-प्राण है ।
...आह से उपजा होगा गान...तो हम कब से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकल कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान। इस बात को कहने वाले सुमित्रानंदन पंत का मानना था कि कविता विचारों या तथ्यों से नहीं, बल्कि अनुभूति से होती है। 
#‘‘जहाँ न पहुंचे  रवि  वहां पहुंचे कवि‘‘यह बात उसकी बेजोड़ कल्पनाशक्ति के कारण ही कहा जाता है।
#रूसी कवि मयाकोव्सकी कहते हैं-अगर कविता को उच्च गुण विशिष्टता प्राप्त करनी है, अगर उसे भविष्य में पनपना है तो हमें चाहिए कि उसे हल्का-फुल्का काम समझ कर अन्य सभी प्रकार के मानवीय श्रम से अलग करना छोड़ दें।
कविता के बाबत विचार करते वक्त इन पंक्तियों के लेखक के अंदर से यह आवाज आई-कविता जंग है नाइंसाफी के खिलाफ, असंवेदनशीलता के खिलाफ। जीव-जगत की हमसफर और प्रेम की भाषा-अभिलाषा है कविता...मगर कविता बस इतनी भर थोड़े ही है।
धूमिल की इस कविता को देखें-
#कविता क्या है?
कोई पहनावा है?
कुर्ता-पाजामा है?'
ना, भाई ना !
कविता-
शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का
हलफ़नामा है।
-- धूमिल
-रीतिकाल, भक्तिकाल, आधुनिक काल, नई कविता, अकविता, लॉंग नाइंटीज, लोकधर्मी कविता, नई सदी की कविता, 16 मई 2006 के बाद की कविता आदि के अपने-अपने रूप हैं, गंध हैं। लिखने की अपनी वजहें हैं। कब,कहां,कैसे और क्यों लिखें पर अंतिम रूप से कुछ भी कहना मुश्किल है। कभी एक यह कविता बन गई थी, पढ़कर देखिए कि कविता कब लिखी जाए-
कविता
कभी भी लिखी जा सकती है
देर रात, अलसुबह या भरी दोपहरी में
जब गोलियां तोड़ती हों सन्नाटा
होता हो कहीं अजान
रसोई चौके से निपट चुकी हों औरतें
जब उकसाई जाती हो भीड़
जन्म लेता हो जब हिंस्र पशु
उगले जाते हों झूठ पर झूठ
कविता कहीं भी लिखी जा सकती है
कैदियों के बीच, सलाखों के पीछे
उन वर्दियों को लानत भेजते हुए
जो रख नहीं पाई थीं अपनी लाज
शराबखाने में, कोठे के पीछे
जहां बार-बार उद्घाटित होता है
मानव सभ्यता का सच
कई-कई झूठ होते हैं बेनकाब।
...................
कविता कैसी हो पर माथापच्ची के साथ ही चिंता इस बात पर भी जरूरी है कि वह लोगों के बीच मौजूद रहे, पाठक से दोस्ती बनाए रखे। वैसे, इस समस्या को कोई तुरता हल भी नहीं। इस बाबत एक पत्रिका में यह छोटी टिप्पणी लिखी थी। पढ़ लीजिए।

तुरता कोई इलाज नहीं
इधर पुस्तक मेले के दौरान एक बड़े प्रकाशन समूह ने कई कवियों के संग्रह लाने की घोषणा की और दूसरे मझोले और छोटे प्रकाशकों ने भी। सोशल मीडिया में। यहां फिलवक्त पैसे जाया नहीं होते। अखबारों में कम ही जा पाते हैं। कभी-कभी कुछ बड़ी पत्रिकाओं में जरूर दिख जाते हैं इनके विज्ञापन। विज्ञापन ही नहीं, तो उससे बाजार के बनने की संभावना भी कम। फिर पाठक कैसे बने। कविता के सामने एक बड़ा संकट तो यह भी है। मंचीय कविता हंसने- हंसाने, उत्तेजित करने की भूमिका से आगे बढ़ नहीं पा रही। कविता के इलाके स्तर में गिरावट की शिकायत पुरानी है। गढ़े गए नए-पुराने प्रतिमानों के बावजूद। यह अपनी जगह ठीक भी है। छंदों से मुक्ति को भी कुछ लोग संकट की वजह मानते रहे हैं। हालांकि निराला से लेकर मुक्तिबोध की कविताएं इसे गलत करार देती हैं। कविता आंदोलनों ने भी एक-दूसरे को दाखिल-खारिज कर कविता को संकट से निकालने की दावा करती रही हैं। इधर हाल में नब्बे के दशक की कविता ने भी यह काम किया। कुछ कवि तो इन आंदोलनों से नामी-गिरामी-ईनामी तो हो जाते रहे हैं। इतिहास या पाठ्यक्रमों में जगह बनाने की जंग में भी कुछ कामयाब हो जाते रहे हैं। पर समाज में वह स्वीकृति नहीं मिल पा रही है, जिसकी अपेक्षा है।
दूसरी तरफ पत्रिकाओं ने, फेसबुक, ब्लाग आदि ने कविता के उत्पादन को बढ़ाने में मददगार की भूमिका अदा की है। युवा लेखन के आयोजनों से भी बहुत सारे कवि सामने आए हैं। यह कविता के लिए अच्छा संकेत है कि बुरा, इस पर एकमत की कोई संभावना नहीं। इसको लेकर गैर कवियों को ही नहीं सुकवियों को भी चिंता है। अच्छी कविताएं लिखने का दावा करने वालों की चिंता है कि बुरी कविता ने उनकी अच्छी कविताओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। मंचीय कविता पहले से ही सितम ढाती रही है, अब पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली बुरी कविताओं ने भी यही काम करना शुरू कर दिया है। यानी इसने अच्छे, चर्चित, प्रसिद्ध सुकवियों की कविताओं के सामने पहचान का संकट पैदा कर दिया है। बुरी कविता की भीड़ में उनकी अच्छी-कालजयी कविताएं गुम हो जा रही हैं। पाठक तो उसे पहचान ही नहीं पा रहे हैं। आलोचक भी पाठकों के कान नहीं पकड़ रहे हैं। उन्हें बता नहीं रहे कि भैये ये रहीं अच्छी कविताएं, इन्हें ही पढ़ो। सपाट-सीधी कविता भी कोई कविता है। वह कविता अच्छी भला हो भी कैसे, जिसे समझने में आलोचक या खुद कोई सुकवि मदद न करे। तो कविता का थोड़ा संकट यहां भी है। 60-70 करोड़ या इससे भी ज्यादा पढ़ने या समझने वालों की भाषा में 500-1000 या इससे भी कम प्रतियां छपने वाली पत्रिकाओं के संपादकों को कविता की तमीज ही नहीं सो ज्ञान बढ़ाऊ गद्य की जगह अच्छी कविता को नुकसान पहुंचाने वाली कविताएं छापे चले जा रहे हैं। प्रकाशक भी बुरे कवि, बुरी कविता को छापे ही चले जा रहे हैं। भले ही 200-300 प्रतियों का संस्करण छाप रहे हैं। यानी पाठक तो अपेक्षित संख्या में बन नहीं रहे। टीवी के धारावाहिक, हास्य के फूहड़ कार्यक्रम और गीत-संगीत से दूर भागती फिल्में कविता या साहित्य के प्रति प्रेम पैदा करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे। दूसरी तरफ विद्यालयों, कालेजों में भी साहित्य के संस्कार को पुष्पित, पल्लवित करने के उपक्रम नहीं के बराबर हैं। यह माहौल कविता ही नहीं, पूरे साहित्यिक-सांस्कृतिक हलके के लिए चिंता बढ़ाने वाला है। फिर भी अपने समय-समाज की विसंगतियों, चुनौतियों को जज्ब करने हुए, सूक्ष्म निरीक्षण, आबजर्वेशन करते हुए साधारण जन तक की समझ में आ सकने वाली भाषा की शरण में कवियों को जाना होगा। हालांकि, ऐसे कवि हमारे बीच हैं भी, कविताएं भी हैं। उस तरफ ध्यान खींचने की पहल भी जरूरी है।
कविता के बाबत जनसत्ता में भी एक छोटा आलेख लिखा था। उसे भी देख लीजिए।
कारवां बढ़ता रहे
इन दिनों कविता को लेकर कुछ साहित्य प्रेमी लोगों को कुछ ज्यादा ही चिंता हो चली है। इसको लेकर गैर कवियों को ही नहीं सुकवियों को भी चिंता होने लगी है। अच्छी कविताएं लिखने का दावा करने वालों की चिंता इस बात लेकर बढ़ी है कि बुरी कविता ने उनकी अच्छी कविताओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। वे कहीं कविता की आतंकारी भीड़ में खोती जा रही है। मंचीय कविता तो पहले से ही लिखी-पढ़ी-छपी जाने वाली कविता पर सितम ढाती रही है, इधर पत्र-पत्रिकाओं में बेशुमार छपने वाली बुरी कविताओं ने भी गजब ढाना शुरूकर दिया है। यानी इसने अच्छे, चर्चित, प्रसिद्ध सुकवियों की कविताओं के सामने पहचान का संकट पैदा हो गया है। रद्दी, खराब या बुरी कविताओं की भीड़ में उनकी अच्छी-कालजयी कविताएं गुम हो जा रही हैं। पाठक तो उन्हें पहचान ही नहीं पा रहे हैं। अच्छी-बुरी की शिनाख्त की तमीज तो उनमें है नहीं, उस पर आलोचक बंधु भी पाठकों के कान नहीं पकड़ रहे हैं। उन्हें बता नहीं रहे कि भैये ये रहीं अच्छी कविताएं, इन्हें ही पढ़ो। यानी अमुक-तमुक को ही पढ़ो। संपादकों के भी बीच-बीच में कान-वान पकड़ते। कहां-कहां से ढूंढ लाते हो भई इतने कवि-कविताएं। काहे फैलाते हो भई अपसंस्कृति। यह तो सांस्कृतिक अपराध है-इतना भी नहीं समझते। हम और हमारे सुकवि जिनके नाम सुझाएं-उनको ही छापा करो बारी-बारी। सीधी-सपाट, किसी के भी समझ आने वाली पंक्तियां भला कविता हो भी कैसे सकती हैं। वह कविता भला अच्छी हो भी कैसे, जिसे समझने में आलोचक या खुद कोई सुकवि मदद न करे।
ग्यारह राज्यों की भाषा, जिसे पुरे देश में 60-70 करोड़ या इससे भी ज्यादा पढ़ने या समझने वाले लोग हों, उस भाषा में 500-1000 या इससे भी कम प्रतियां छपने वाली पत्रिकाओं के मूढ़ संपादकों को कविता की तमीज ही नहीं सो बुरी कविता छापे चले जा रहे हैं। ये लघु पत्रिका निकालने वालों का तो कविता के बिना काम ही नहीं चलता। कुछ सिरफिरे प्रकाशक हैं, जो बहुत सारे बुरे कवियों की बुरी कविताओं की किताबें छापे चले जा रहे हैं। भले ही वे 200-300 प्रतियों के संस्करण हो।
ये लोग बाजारू या बड़ी पूंजी से निकलने वाले पत्रओ-पत्रिकाओं से भी सबक नहीं लेते। वहां कितने प्रेम से कविता ही क्यों, पूरे साहित्य को हाशिए पर धकेल दिया गया है। फैशन, प्रसाधन, फिल्मी गपशप, टीवी समाचार, खेल, मंत्र-तंत्र, राशिफल आदि की जगह कविता या साहित्य के लिए जगह क्यों जाया करनी चाहिए। यहां के संपादक कितने समझदार हैं। वे अच्छी-बुरी के चक्कर में फंसते ही नहीं। समझदारी का ही नहीं, समय का भी यही तकाजा है कि इसी तरह के ज्ञान बढ़ाऊ गद्य छापे जाएं, जैसा कि वे छाप रहे हैं। अच्छी कविता के पुजारियों को बाकी चीजों से भला क्या लेना-देना।
बेहतर होता कि बुरी कविताओं से ऊबे लोग यह लिख-पढ़ कर बताते कि ऐसे लिखी जाती है अच्छी कविता। हमारे आलोचक बंधु भी कोई तरकीब बता देते या कुछ अच्छी कविताएं लिख कर बतौर नजीर पेश करते, जिससे बुरी कविता लिखने वाले कुछ सबक लेते।
दरअसल, काव्य-लेखन दृष्टि, अहसास व अभ्यास का भी मामला है। कलात्मक साधना के साधक अपनी साधना में लगे रहें, इस पर भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पर बेबसी, बेचैनी और गुस्से से भरे माहौल में धीर-गंभीर कविता कम ही जन्म लेगी। अधीरता के संवेग से निकली कविता से वही अपेक्षित है, जो तर्कसंगत भी लगे। फूल, पत्तियां, बहार, जीवन-मृत्यु के रहस्य की जगह लोक के लौकिक और कभी न खत्म होते दिखने वाले जीवन-संघर्ष-विसंगतियों की चर्चा जब कविता में होगी तो उसमें सपाट बयानी भी होगी और आड़ी-तिरछी अपूर्ण-सी लगने वाली पंक्तियां भी, जो आंखों-दिलों में चुभती हैं, लिखी जाएंगी। दिल्ली बलात्कार कांड पर या ऐसी ही किसी वीभत्स वारदात पर कविता लिखी जाएगी तो उसमें धीरता की चाह कवि और कविता पर ज्यादती होगी। प्रतिक्रिया और प्रतिरोध की भाषा सपाट, आक्रामक और मुखर ही होगी। ऐसा होना समय की मांग होती है। कलात्मक अभिव्यक्ति की मालाजाप अराधना कम।
इस सवाल का जवाब हमें तलाशना ही चाहिए कि कविता में बौद्धिकता की बोझ कितनी होनी चाहिए। क्या इतनी कि वह साहित्य के साधारण पाठक को संप्रेषित ही न हो पाए और पाठक पत्रिका या किताब के पन्नों को पलटते हुए कहीं और कूच कर जाए। दरअसल, वह कविता किसी काम की नहीं जिसे सिर्फ और सिर्फ कवि या फिर उसका चहेता आलोचक या संपादक ही समझ पाए। सहज संप्रेषित कविता को कमजोर या बुरी कविता कह कर नाक-भौं सिकोड़ने का कोई मतलब नहीं।
हिंदी में कविता के ऊफान से ऊबे लोगों को बंगला, मराठी, मलयालम, तमिल, असमिया के कवितामय संसार को भी देखना चाहिए। कविता से यहां प्रेम का रिश्ता है, ऊब का नहीं। यहां सैकड़ों की संख्या में कविता की पत्रिकाएं निकल रही हैं। अपने कोलकाता में पुस्तक मेले में लघु पत्रिकाओं के लिए सम्मान के साथ जगह दी जाती है। बड़ी संख्या में कवि-कवयित्रियां कविताएं सुनते-सुनाती हैं। कविता पुस्तकों का लोकार्पण होता है। कवि-कवयित्रियों की कविताओं की आवृति होती है। यहां लगने वाले लघु पत्रिका मेले में पांच-छह दिन डेढ़-दो सौ कवि अपनी कविताएं सुनाते हैं। दूसरों की सुनते हैं। यहां नए-युवा कवियों को गर्मजोशी से स्वागत किए जाने की परंपरा है। नए धीरे-धीरे मंजेंगे इस उम्मीद के साथ। रद्दी-बुरी-खराब का रोना यहां कम ही है।
कविता के चमन में...

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

पाठकीय !

पाठकीय !

कोई उम्मीद हो जिसमें,खबर वो
बताओ क्या किसी अखबार में है

अब इस शेर का जवाब कोई क्या दे , सवाल में ही दर्ज है । नहीं है , नहीं है , नहीं है...लूट है , चोरी-डकैती है , भ्रष्टाचार है , हत्या है , आत्महत्या है , धोखा है , बलात्कार है और है जुमलों की बाहर । अखबारों में , चैनलों में , सोशल मीडिया में इन्हीं वारदातों की खबरें ।
इसी वजह से अब इस कहे पर भरोसा भी नहीं होता कि -

वो रंजिश में नहीं अब प्यार में है
मेरा  दुश्मन  नये किरदार  में  है

ये दोनों शेर किताब की पहली गजल की है । किताब का नाम है -"तेरा होना तलाशूं" और इस तलाश में सिर खपाने वाले गजलगो हैं विनय मिश्र । अतुकान्त कविता की खेती  के साथ दोहे भी जमकर दूहा है इन्होंने । मगर फिलवक्त इनकी गजलों से मुलाकात ।

ऐसे जीना है कभी सोचा न था
जी रहा था और मैं जिंदा न था
.....
याद  आने  के बहाने  थे कई
भूलने का एक भी रस्ता न था

इसी तरह की विडम्बनाओं से दो-चार की  तमाम जगहें हैं , कोनें हैं विनय की गजलों में, जहां मन दुखी तो कभी बेचैन हो जाता है पाठक का ।
विनय समय सजग कवि हैं और इसलिए वे अभिव्यक्ति के जोखिम उठाने वालों की कतार में शामिल । उनकी हर गजल कुछ कहती , सुनती , बतियाती सी लगती है । लोकोन्मुखी स्वर का सानिध्य का अहसास देती ।

उस हवा के साथ घर की हवा भी बदली
वक्त बदला तो सभी की भूमिका बदली
....
तुम न बतलाओ भले राजी खुशी दिल्ली
मैं तुम्हें  महसूस  करता हूं  अरी  दिल्ली
....
मैं   किसे  चाहूं न  चाहूं    बात  छोटी है
पर ये भी तय कर रही है अब नई दिल्ली
....
इस   तरह भारी   हुई हैं   आजकल रातें
लोग दहशत में हैं जीवन किस तरह काटें

ये शेर इतने सरल और साफ हैं , जो बाजार की, सत्ता की  हमारी जिंदगी में जारी बेरोक-टोक घुसपैठ की ओर इशारा कर देते हैं ।
इस किताब के ब्लर्ब में आलोचक पंकज गौतम के इस कथन से सहमत होने की पूरी गुंजाईश बनती है कि -विनय की गजलों में समकालीन इतिहास अपने समस्त अन्तर्विरोधों के साथ विन्यस्त है । यह ऐतिहासिक गतिशीलता और आधुनिकता की समझ के अभाव में सम्भव नहीं है, चाहे वह अचेत रूप में हो अथवा सचेत रूप में ।....
इस कथन के गवाही देते कुछ शेर, जो ध्यान खींचते हैं -

हाथ में  अपने  लिये परचम  पलाशों का
हर तरफ दहका हुआ मौसम पलाशों का

चाहतों का एक जंगल है या ख्वाबों का
कारवां  लेकर चले   हैं हम  पलाशों का
...
पहले सूली पे मैं चढ़ाऊं भी
फिर मसीहा तुझे बनाऊं भी
....
मिट न जाये जिंदगी का स्वर चलो बातें करें
बेजुबां कर दे न हमको डर चलो बातें करें
....
और जिस शेर से किताब का नाम चुना गया है , एक नजर उस पर भी -
जो डूबा है वही तारा तलाशूं
मैं अपने में तेरा होना तलाशूं

कुल मिलाकर इस किताब के बाबत कहना यह है कि पठनीय है । किसी कविता , गजल की किताब में कुछ कवितायें , काव्य पंक्तियाँ या कोई शेर भी मन में अनुगुंजित होने लगे तो उससे गुजरना सुखकर होता है । इस किताब के साथ ऐसा ही है ।
इसमें ऐसी ही 105 गजलें संग्रहित है । इसे छापा है -शिल्पायन बुक्स ने । इस किताब के लिये समकालीन गजल के परिचित नाम विनय मिश्र को बधाई !