शैलेंद्र शांत
बुधवार, 11 जनवरी 2023
मुझे पहचानोःएक पाठकीय
मंगलवार, 10 जनवरी 2023
अटारी पर चांद
'अट्ठारह साल की लड़की अकेली विश्व भ्रमण के लिए निकली है, यह बात मेरे लिए नई तो नहीं, क्यों कि मैं पहले भी कुछ लड़कियों से मिल चुकी हूं,लेकिन आश्चर्य यह था कि ...केवल एक हजार यूरो की रकम उसकी थाती थी। उसका प्लान है कि वह जहां जाएगी कुछ काम कर खर्च निकाल लेगी। ...उसके भ्रमण की सीमा में कई देश थे,पर भारत नहीं।...मैंने कहा कि जूलिया....लेकिन तुम भारत आए बिना विश्व भ्रमण करोगी अच्छा नहीं लग रहा है।...मुझ से अनेक बार पूछा गया भारत में इतने रेप क्यों होते हैं और मुझे उन्हें समझाने वक्त लगता कि रेप भारतीय संस्कृति नहीं, वैश्विक संस्कृति का ही एक भाग है..रेप की घटनाएं ज्यादा होते हुए भी स्थिति ऐसी नहीं कि आप भारत में रह ही नहीं सकते।...खैर, हम बात जूलिया की कर रहे हैं, ना जाने कितनी लड़कियां हमारे घरों से निकलना चाहती हैं, लेकिन कहां निकल पातीं, विश्व भ्रमण का सपना तो किशोर-युवकों का भी पूरा नहीं हो पाता।'
ये उद्धरण कवयित्री रति सक्सेना की यात्रा-वृतांत की किताब 'अटारी पर चांद' से हैं। रति जी कि इस किताब में तमाम कलाकृतियों, कला-दीर्घाओं, सुंदर भवनों आदि के आंखों देखे ब्यौरे हैं, जो जर्मन की समृद्धि की कहानी बयान करती है, साथ ही युद्धों के, नाजी सेना की क्रूरताओं की बानगी भी पेश हैं इसमें। विडंबना और समय का फेर यह कि उसके देश में ही हिटलर पर कोई बात नहीं करना चाहता।
लेखिका को जर्मन कलाकारों की संस्तुति पर प्रदत्त विश्व प्रसिद्ध वालब्रेता रेजीडेंसी में स्कॉलरशिप मिली थी। उन्होंने 2016 में लगभग तीन माह के प्रवास में वहां ‘पोइट्री थेरोपी’ प्रोजेक्ट पर काम किया। जाहिर है, अपनी यात्रा के उल्लेखनीय पल, अनुभव, प्रेक्षण भी पन्नों पर दर्ज करती रहीं, जिसका सुफल यह किताब है। और हम जैसे उनकी आँखों से इस जर्मन को देख, महसूस कर पा रहे हैं। यकीनन दूसरे पाठक भी लाभ उठा रहे होंगे इसका।
एक यह विवरण- '...एनरेट्टे अकेली रहती हैं। एक बार उन्होंने बताया कि उनका एक ब्वॉय फ्रेंड था, जो धोखा देकर चला गया। बाद में वह बताने लगी कि आजकल जर्मन पुरुष जवानी में गर्लफ्रेंड के साथ रहते हैं, जब वे अधेड़ या बूढ़े हो जाते हैं तो थाईलैंड जाकर थाई लड़कियां लाते हैं, वे अधिकतर खरीद कर ही लाते हैं। फिर वे उनकी सेवा करती हैं, क्योंकि जर्मन स्त्रियां मजबूत और मेहनती होती हैं, वे स्वतंत्र व्यक्तित्व रखती हैं।'
तो जर्मन का एक तस्वीर यह भी है।
एक मार्मिक विवरण यह भी - जब हम रोतेन्बर्ग पहुंचे तो महसूस हो गया कि हम पर्यटन केंद्र में पहुँच गए हैं। गुड़ियों के घरौंदों जैसे खूबसूरत रंगे-चुने घर, रंगों के चुनाव में हर घर एक दूसरे से प्रति स्पर्धा करता हुआ-सा। ...हम एक संग्राहलय में पहुँच गए, जिसमें सजा देने के अमानवीय औजार थे। सच कहूं तो शहर की सारी खूबसूरती इस संग्राहालय को देखते ही भड़भड़ा कर टूट गई।...दोष कुछ भी हो सकता था, किसी स्त्री का डायन करार दिया जाना या किसी पुरुष के व्यभिचारी होने की शंका होना या फिर कोई चोरी-चपाटी आदि। सजा में नाखूनों को उखाड़ने से लेकर जीभ पर ताला लगाने तक के औजार थे।...यह सब देख मन बहुत व्यथित हो उठा...और सच कहूं तो लगा कि लौट चलो इस देश से।'
बहरहाल, इसी देश में अब जूलिया की पीढ़ी भी तैयार है। एक दिन बर्लिन की दीवार भी टूटी। और कई भ्रम भी। नहीं बदला है तो शायद अंध-राष्ट्रवाद की परिणति के दुःस्वप्न। हिटलर के प्रति इतनी घृणा की सामान्य जर्मन उस पर बात नहीं करना चाहता।
प्रवेश वर्जित: डकाउ यातना शिविर जिसे कंसेंट्रेशन कैंप कहा जाता है, हिटलर की नाजी मानसिकता का पहला शिविर था, जिसे सोच-समझ कर यहूदियों की हत्या करने के उद्देश्य से बनाया गया था। कहा जाता है कि इसमें विभिन्न देशों के दो लाख से ज्यादा कैदी थे, जिनमें से 41,500 कैदी मारे गए थे। ( मार दिए गए थे, लिखना ज्यादा सही होगा) सहसा सब चुप्पा से गए। जैसे याद आया कि हम मौत से मिलने जा रहे हैं।...बाहर बोर्ड था, (जिस पर लिखा था) कृपया बच्चों और कुत्तों को भीतर न ले आएं।...फिर महसूस हुआ कि हम ही कैदी हैं।...मृतकों की राख पर फुलवारी उगा रखी थीबोर्ड पर लिखा था कि कोई इस फुलवारी पर पैर न रखें, यहां मृतकों की राख बिछी है।...चैंबरों की तरफ जाने से पहले तीन उपासना घर दिखे, शायद उनका निर्केमाण तब हुआ, जब यह यातना घर से शरणार्थी शिविर में बदला गया। मैं यही सोच रही थी कि देव यहां वास कर रहे थे तो उन्होंने इस अत्याचार को क्यों सहा। ( अपने यहां राम जी भी तो सह ही रहे हैं, भक्तों के उत्पात को)'
इस किताब से एक विवरण और- 'लौटते वक्त मैं और शारलोत्ते साथ थे, हम लोग राजनीतीक स्थितियों की बात करने लगे। मैंने कहा कि युद्ध के बाद जर्मनों के साथ जो कुछ हुआ, वह भी दुखद था, क्योंकि समस्या किसी एक नेता ने पैदा की थी।'
शारलोते ने जवाब दिया, 'जब जनता किसी गलत नेता को चुनती है तो वह उसके पाप में बराबर की भागीदीर बन जाती है।'
'निःसंदेह, लेकिन जब जनता भीड़तंत्र के साथ चलती है।' मैंने कहा।
'फिर भी गलती तो है ही', शारलोत्ते का जबाव था।
'गलती का पता जब तक लगता है, अक्सर देर हो जाती है'-मैं कहना चाहती थी, लेकिन चुप ही रही।
अपने मेजबान, दोस्त-गाइड के साथ घूमती-बतकही करती और तमाम लुभाने और बदरंग दृश्यों के लेखकीय ब्यौरे से भरे इस वृतांत से गुजर लेना, बहुत से अहसासों से दो-चार होने जैसा भी है।
इस किताब में रति जी ने कुछ कविताएं भी दर्ज की है। डकाउ पर लिखी बहुत ही मार्मिक कविता के इस अंश के साथ इस चर्चा को विराम देने की इजाजत चाहूंगा।
'लिखा तो यह भी था कि
कृपया शोर ना मचाएं, जोर से ना हँसें
ऐसा कुछ ना करें कि मृतकों की आत्मा को
कष्ट मिले,
लेकिन व्यक्तिगत सामान वाली लाइब्रेरी में
कैदियों के सामान में खूबसूरत प्रेमिकाओं की तस्वीरों के साथ
बच्चों और पालतू कुत्तों की तस्वीरें भी हैं
कैम्प में सन्नाटा है, सैकड़ों दर्शनार्थियों के बावजूद
मानो कि अभी कोई ना कोई मृतात्मा बोल उटेगी
.....
लेकिन क्या आदमी को आदमी बनाने के लिए
यातना घर जरूरी है
सवाल अधूरा है...'
इस पठनीय 'यात्रा-वृतांत' की किताब को न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
सोमवार, 19 दिसंबर 2022
'ग़जल को ग़ज़ल ही रहने दें'
जैसे भाषा में बोलियां हैं सा'ब
मुल्क में वैसे ही मियां हैं सा'ब
साथ सदियों से रहते आए मगर
अब भी सदियों की दूरियां हैं सा'ब
आपने ऐसे कैसे सोच लिया !
आपके भी तो बेटियां हैं सा'ब
जुट गयीं तो नहीं बचेगा कुछ
ये सियासत की चीटियां हैं सा'ब
रंग मजहब बिरादरी पैसा
प्यार में कितनी गुत्थियां हैं सा'ब
एक ही तो 'किताब' है अपनी
उसमें भी कितनी गलतियां हैं सा'ब
ये न टेढ़ी हुईं न घी निकला
कैसी मतदानी उंगलियां हैं सा'ब
इनको तो बक्श दीजिए मालिक !
गमछे में बांधी रोटियां हैं सा'ब
यह देवेंद्र आर्य की एक गजल है, जो इनके ताजा संग्रह 'मन कबीर' में दर्ज है। इस संग्रह में ऐसी ही कई गजलें हैं, तल्ख,करारी और कुछ कमजोर सी लगने वाली गजलें भी, जिनमें कुछेक मजबूत शेर हैं। ये सभी समकाल से नज़र मिलाकर बतियाती, सवाल और मुठभेड़ करती लगती हैं।
जैसे-
चिटक बेशक गए हैं दिल के रिश्ते
अभी तक टूट कर बिखरा नहीं हूँ
रिश्तों में तोड़-फोड़ के इस दौर खुद को बिखरने से बचाना, उम्मीद को उम्र देने जैसी बात है।
......
कोई कैसे मान ले जिंदा हैं आप
हो कोई काग़ज अगर, दिखाइये
इधर की यह बड़ी बिडंबना और भुगतभोगी ही इस पीड़ा को समझते हैं। इस पीड़ा को जुबान देने वाला शायर भी बेशक।
......
आप दलहन की बात छेड़ेंगे
जिक्र वह छेड़ देगा केसर का
आज की सियासत की बेशर्मी और असंवेदनशीलता को उजागर करने के लिए यह शेर कितना माफिक है, बताने की जरूरत नहीं।
.....
सब चुप हैं डर के मारे मगर फिर भी हो रही
राजा के नंगे होने की चर्चा गली-गली
....
जिसको देखो है वही सूखे बदन बारिश में
छत भी कोई नहीं, सर पर कोई छाता भी नहीं
....
मोहब्बत नाम है उस जिंदगी का
कि जिसमें आँच है और प्यास भी है
.....
बेटा बहू तो दूर, खसम भी न आए पास
मैं सो गई थी रात में घर को खिला-पिला
....
धर्म और पूँजी का का है रिश्ता यही
ताने में बाना, बाने में ताना
....
ये चंद शेर भी बहुत कुछ कहते हैं -अपने समय के यथार्थ को आईने के सामने खड़े करते हुए। देवेंद्र कहन के एक अलग अंदाज लिए हमारे समय के खास गजलकारों में से एक हैं। प्रगतिशील, जनवादी और प्रयोगधर्मी । यह उनका छठा ग़ज़ल संग्रह है। दिल्ली के 'न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन' से आया है ।
इनकी इस किताब पर अग्रज कवि- गजलगो, संपादक रामकुमार कृषक कहते हैं कि "इनके यहां कविता की ताज़गी और ताप दोनों को एकसाथ अनुभव कर सकते हैं। ...नए बिंबों और प्रतीकों की भी उनके यहां कमी नहीं , और शेरों की ज़मीनी अंतर्वस्तु के अनुरूप उन्हें बरतने की सलाहियत की भी । "
इस संग्रह के लिए किसी से ब्लर्ब या भूमिका नहीं लिखाई गई है। आर्य ने जरूर 'कुछ अपनीःकुछ शायरी की' बात कही है। गजल के सफर के बाबत बात करते हुए देवेंद्र इस बात से सहमत दिखते हैं कि गजल को गजल ही रहने दिया जाए। अपने बााबत यह कहते हैं कि" बताने के लिए सिर्फ इतना है कि मैं शायरी करता हूं, सियासत नहीं। शायरी ही मेरी सियासत है। जैसे कबीर अपनी भक्ति में सियासत कर रहे थे।....कविता भी डूबते को तिनके को सहारा होती है, जैसे कि जैसे ईश्वर दुखी इंसान को आखिरी सहारा..."
उनके इस कथन की गवाही देती इसी किताब की यह गजल गौरतलब है-
तन तुलसी और मन कबीर भए
तब जाके शायर फ़क़ीर भए
रूमी अस जब रूह भयी तब
सूरदास जस ई शरीर भए
कविता होइ गए खुदे निराला
मुक्तिबोध सउंसे ज़मीर भए
तू कचरस हम चाउर कच्चा
प्यार पगे दूनो बखीर भए
छूट गयो पगहा कवित्त कै
जब कविता में कवि अधीर भए
काटत पीटत लांघत रेखा
छोट बड़ा हमहूं लकीर भए
आपे नहीं अकेल आरिया
एकरे पहिले एक 'नज़ीर' भए
मन में कबीर को जगह देना जोखिमों को आमंत्रण देना है। देवेंद्र की गजलें, इसके लिए समर्पित लगती हैं। दुष्यंत कुमार ने हिंदी में गजल जो मान दिलाया, उसे आगे ले जाने वालों में आर्य भी शामिल एक उल्लेखनीय नाम बन चुके हैं।
उन्हें इस संग्रह के लिए बधाई!
सोमवार, 12 दिसंबर 2022
कैलाश मनहर की किताब पर संक्षिप्त चर्चा
शुक्रवार, 25 मार्च 2022
श्रम और संबंधों को तरजीह देती कविताएं
बलभद्र
सोमवार, 28 फ़रवरी 2022
पाठकीय!
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